केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत देशभर में मछुआरों और मत्स्य किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। योजना के अंतर्गत फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (एफएफपीओ) के गठन के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है, ताकि मत्स्य पालकों की सौदेबाजी क्षमता बढ़े और उन्हें संगठित रूप से बेहतर बाजार अवसर मिल सकें।
मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के मत्स्य विभाग द्वारा पिछले पांच वर्षों, अर्थात वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक, देश में कुल 2,195 एफएफपीओ के गठन के लिए 544.86 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई। इनमें तमिलनाडु राज्य के लिए 113 एफएफपीओ शामिल हैं। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का क्रियान्वयन राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी), लघु कृषक कृषि व्यवसाय संघ (एसएफएसी), राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ (नाफेड) तथा राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) जैसी केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से किया जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक देश में कुल 1,990 फिश फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन गठित किए जा चुके हैं, जिनमें तमिलनाडु में 113 एफएफपीओ का गठन हुआ है। हालांकि फिलहाल तमिलनाडु के मयिलादुथुरै लोकसभा क्षेत्र में विशेष रूप से कोई नया एफएफपीओ गठित करने का प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो तेलंगाना में सर्वाधिक 245 एफएफपीओ गठित किए गए हैं। इसके बाद महाराष्ट्र में 196, असम और आंध्र प्रदेश में 176-176, मणिपुर में 148, केरल में 127, त्रिपुरा में 122 और तमिलनाडु में 113 एफएफपीओ बने हैं। मध्य प्रदेश में 107, गुजरात में 95, उत्तर प्रदेश में 75, कर्नाटक में 64, छत्तीसगढ़ में 56, बिहार में 48 और पश्चिम बंगाल में 41 एफएफपीओ का गठन किया गया है। वहीं कुछ छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह संख्या अपेक्षाकृत कम रही।
यह जानकारी लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने दी। सरकार का मानना है कि एफएफपीओ के गठन से मत्स्य क्षेत्र में संगठित विकास को बढ़ावा मिलेगा, उत्पादन और विपणन में सुधार होगा तथा मछुआरा समुदाय की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।
मत्स्य क्षेत्र में उत्पादक संगठनों के विस्तार से यह उम्मीद की जा रही है कि छोटे और सीमांत मत्स्य किसानों को सामूहिक शक्ति मिलेगी, वे बेहतर तकनीक, संसाधन और बाजार तक पहुंच बना सकेंगे, और इससे देश में मत्स्य आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी।

