देश के डेयरी सेक्टर में एक बड़ा और अनोखा बदलाव आने वाला है। सहकारिता मंत्रालय ने 15 राज्यों की 26 मिल्क कोऑपरेटिव्स को एक खास सुझाव दिया है, जिसके तहत अब दूध के साथ-साथ गोबर की भी बड़े पैमाने पर खरीद की जाएगी। इस योजना में National Dairy Development Board (NDDB) की अहम भूमिका होगी, जो मिल्क कोऑपरेटिव्स के साथ समझौता कर इस मॉडल को लागू करेगी।
योजना के मुताबिक, इन राज्यों में हर रोज 8 से 10 करोड़ रुपये का गोबर खरीदा जाएगा। अगर मात्रा की बात करें तो यह आंकड़ा करीब 16 करोड़ टन प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। इसका सीधा फायदा पशुपालकों को मिलेगा, क्योंकि अब वे सुबह-शाम दूध के साथ गोबर भी बेच सकेंगे। इस पहल का उद्देश्य किसानों और पशुपालकों की आमदनी बढ़ाना और उन्हें संगठित डेयरी सिस्टम से जोड़ना है।
दरअसल, आज भी बड़ी संख्या में पशुपालक निजी कंपनियों को दूध बेचते हैं। सरकार चाहती है कि वे मिल्क कोऑपरेटिव से जुड़ें ताकि उन्हें बेहतर दाम और अतिरिक्त आय के अवसर मिल सकें। उत्तर प्रदेश के बनारस जैसे कुछ इलाकों में इस मॉडल की शुरुआत भी हो चुकी है और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।
इस योजना से तीन बड़े फायदे सामने आ रहे हैं। पहला, पशुपालकों को गोबर बेचकर अतिरिक्त आमदनी होगी। दूसरा, गोबर का वैज्ञानिक प्रबंधन होगा जिससे पर्यावरण को फायदा मिलेगा। तीसरा, इससे ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। गोबर से बायोगैस बनाई जाएगी, जिसका इस्तेमाल डेयरी प्लांट में बिजली और ऊर्जा की जरूरत पूरी करने में किया जाएगा।
गोबर मैनेजमेंट का यह मॉडल काफी व्यवस्थित है। डेयरी प्लांट गोबर खरीदकर उससे गैस और बिजली तैयार करेंगे, जिससे दूध प्रोसेसिंग का काम होगा। इसके बाद जो स्लरी बचती है, उसे प्रोसेस कर तरल जैविक खाद बनाई जाती है। यह खाद फिर पशुपालकों और किसानों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराई जाती है। इससे खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है।
इस पहल का एक और बड़ा फायदा गांवों में साफ-सफाई के रूप में दिख रहा है। पहले जहां गांवों में गोबर इधर-उधर जमा रहता था, वहीं अब पशुपालक इसे इकट्ठा कर डेयरी प्लांट तक पहुंचा रहे हैं। इससे गांवों में गंदगी कम हो रही है और स्वच्छता का स्तर सुधर रहा है, खासकर बरसात के मौसम में।
कुल मिलाकर, यह योजना डेयरी सेक्टर में एक ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है। अगर इसे सफलतापूर्वक लागू किया गया, तो यह न सिर्फ किसानों की आय बढ़ाएगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास में भी अहम भूमिका निभाएगी।

