देश में उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चल रही चिंताओं के बीच केंद्र सरकार को बड़ी राहत मिलने के संकेत मिले हैं। हाल ही में जारी यूरिया आयात टेंडर में अपेक्षा से काफी कम कीमतों पर बोलियां मिलने के बाद सरकार चालू वित्त वर्ष के लिए फर्टिलाइजर सब्सिडी बजट का पुनर्मूल्यांकन कर सकती है। उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस. शर्मा ने गुरुवार को इस संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।
उन्होंने कहा कि नवीनतम यूरिया आयात टेंडर में प्राप्त कम कीमतों ने सरकार को सब्सिडी आवश्यकताओं पर दोबारा विचार करने का अवसर दिया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय आयात की वास्तविक मात्रा, घरेलू मांग, उपलब्ध स्टॉक और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया जाएगा।
कम कीमतों ने बढ़ाई उम्मीदें
अपर्णा शर्मा के अनुसार, हाल ही में यूरिया आयात के लिए जारी टेंडर में जो कीमतें सामने आई हैं, वे शुरुआती अनुमानों से काफी कम हैं। यदि यह रुझान आगे भी जारी रहता है और वैश्विक बाजार में कीमतें नियंत्रित रहती हैं, तो सरकार को उर्वरक सब्सिडी पर होने वाले खर्च में राहत मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि देश में उर्वरकों का उत्पादन सामान्य रूप से जारी है और वर्तमान स्टॉक स्थिति भी संतोषजनक है। ऐसे में भारत की आयात आवश्यकताएं पहले के अनुमान से कम हो सकती हैं। हालांकि खपत, उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति जैसे कई कारक भविष्य की जरूरतों को प्रभावित करेंगे।
यूरिया टेंडर में मिली रिकॉर्ड कम बोली
उर्वरक क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव हाल ही में यूरिया आयात टेंडर में देखने को मिला। नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL), जो यूरिया आयात के लिए अधिकृत एजेंसियों में से एक है, को 1.7 मिलियन टन यूरिया आयात के लिए 444.9 डॉलर प्रति टन से 449.3 डॉलर प्रति टन के बीच लैंडेड कॉस्ट की बोलियां प्राप्त हुईं।
यह कीमतें कुछ महीने पहले भारतीय पोटाश लिमिटेड (IPL) द्वारा जारी टेंडर की तुलना में लगभग आधी हैं। उस समय 2.5 मिलियन टन यूरिया आयात के लिए 935 डॉलर से 959 डॉलर प्रति टन के बीच बोलियां स्वीकृत की गई थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी गिरावट वैश्विक बाजार में आपूर्ति की स्थिति में सुधार और मांग के संतुलन का संकेत हो सकती है। यदि आने वाले महीनों में भी कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार का सब्सिडी बोझ काफी हद तक कम हो सकता है।
सब्सिडी बोझ बढ़ने की थी आशंका
कुछ समय पहले उर्वरक विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया था कि वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान उर्वरक सब्सिडी की आवश्यकता 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। यह अनुमान बजट में निर्धारित 1.71 लाख करोड़ रुपये की तुलना में लगभग दोगुना था।
इस आशंका के पीछे मुख्य कारण वैश्विक उर्वरक कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव थे। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित व्यवधान, ईरान-इजराइल संघर्ष और उत्पादन इकाइयों को हुए नुकसान के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही थी।
हालांकि नवीनतम टेंडर में मिली कम कीमतों ने इन चिंताओं को कुछ हद तक कम किया है।
पिछले वर्ष बढ़ा था सब्सिडी खर्च
वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने उर्वरक सब्सिडी पर कुल 2.17 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे। इसमें यूरिया सब्सिडी का हिस्सा 1.42 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) योजना के तहत 74,999 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
यह राशि संशोधित अनुमान 1.86 लाख करोड़ रुपये से लगभग 17 प्रतिशत अधिक थी। अधिकारियों के अनुसार मार्च 2026 से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में आई तेजी के कारण सरकार पर अतिरिक्त सब्सिडी बोझ पड़ा था।
खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त स्टॉक
सरकार के अनुसार खरीफ 2026 सीजन के लिए देश में उर्वरकों की स्थिति फिलहाल संतोषजनक बनी हुई है। खरीफ सीजन के दौरान कुल 38.39 मिलियन टन उर्वरकों की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है।
इसके मुकाबले वर्तमान में लगभग 19.57 मिलियन टन उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध है, जो कुल आवश्यकता का लगभग 51 प्रतिशत है। यह स्थिति किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मानी जा रही है।
अपर्णा शर्मा ने बताया कि अब तक किसान लगभग 9.46 मिलियन टन विभिन्न प्रकार के उर्वरकों की खरीद कर चुके हैं, जो खरीफ सीजन की कुल अनुमानित आवश्यकता का लगभग 25 प्रतिशत है।
घरेलू उत्पादन भी मजबूत
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि घरेलू उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और इससे आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल रही है।
फरवरी में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद से देश में लगभग 7.1 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन हुआ है। वहीं घरेलू उत्पादन और आयात को मिलाकर सभी प्रकार के उर्वरकों का कुल 15.3 मिलियन टन अतिरिक्त स्टॉक तैयार किया गया है।
यह उपलब्धता किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने और बाजार में संभावित कमी की स्थिति से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
आयात स्रोतों का विस्तार
सरकार ने उर्वरकों की आपूर्ति को सुरक्षित बनाए रखने के लिए आयात स्रोतों में भी विविधता लाई है। वर्तमान में भारत ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्किये और नीदरलैंड्स जैसे देशों से यूरिया आयात कर रहा है।
वहीं डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) और एनपीके उर्वरकों की खरीद रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से की जा रही है। इन उत्पादों का अधिकांश आयात रेड सी मार्ग के माध्यम से होता है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया और अन्य उर्वरकों की कीमतें नियंत्रित बनी रहती हैं, तो सरकार को सब्सिडी खर्च में उल्लेखनीय राहत मिल सकती है। साथ ही किसानों को भी समय पर और उचित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराना आसान होगा।
फिलहाल कम कीमतों पर मिले आयात प्रस्ताव और मजबूत घरेलू स्टॉक स्थिति ने सरकार को राहत दी है। आने वाले महीनों में वैश्विक बाजार की दिशा और घरेलू मांग यह तय करेगी कि उर्वरक सब्सिडी बजट में कितना बदलाव किया जाएगा।

