भारत सरकार देश को उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है। इसी कड़ी में अब दो नए यूरिया संयंत्रों के जल्द शुरू होने से देश की वार्षिक यूरिया उत्पादन क्षमता में 25.4 लाख टन की बढ़ोतरी होने वाली है। सरकार का मानना है कि इससे घरेलू स्तर पर यूरिया की उपलब्धता मजबूत होगी और आयात पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आएगी।
यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और उर्वरकों की बढ़ती कीमतें कई देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। भारत सरकार किसानों को इन वैश्विक चुनौतियों के प्रभाव से बचाने के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है।
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2014 के बाद से देश में छह नए मेगा यूरिया संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से वार्षिक उत्पादन क्षमता में कुल 76.2 लाख टन की वृद्धि हुई है। अब दो और उच्च क्षमता वाले यूरिया संयंत्र उत्पादन शुरू करने की तैयारी में हैं, जिससे देश की उर्वरक सुरक्षा और मजबूत होगी।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में घरेलू यूरिया उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2014-15 में जहां यूरिया उत्पादन 225 लाख टन था, वहीं 2023-24 में यह बढ़कर रिकॉर्ड 314.07 लाख टन तक पहुंच गया। हालांकि 2024-25 में उत्पादन थोड़ा घटकर 306.67 लाख टन रहा, फिर भी यह पिछले वर्षों की तुलना में काफी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।
इसके बावजूद भारत को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयात का सहारा लेना पड़ता है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश ने 100 लाख टन से अधिक यूरिया का आयात किया। यही कारण है कि सरकार घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने को प्राथमिकता दे रही है ताकि विदेशी बाजारों पर निर्भरता कम हो सके और किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराया जा सके।
यूरिया के साथ-साथ फॉस्फेटिक एवं पोटाश (P&K) उर्वरकों के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वर्ष 2024-25 में इन उर्वरकों का उत्पादन रिकॉर्ड 211.22 लाख टन तक पहुंच गया, जबकि 2014-15 में यह आंकड़ा 159.54 लाख टन था। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कई कंपनियां नए प्रोजेक्ट्स के माध्यम से उत्पादन क्षमता बढ़ाने में जुटी हुई हैं, जिससे भविष्य में देश की उर्वरक जरूरतों को पूरा करने में और मदद मिलेगी।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अन्य भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण वैश्विक उर्वरक बाजार प्रभावित हुआ है। इन परिस्थितियों में प्राकृतिक गैस की कमी, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और शिपिंग में देरी जैसी समस्याएं सामने आई हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास समुद्री परिवहन प्रभावित होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ा है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सरकार ने सक्रिय रणनीति अपनाई है। सरकार ने वैकल्पिक परिवहन मार्गों की पहचान की, विभिन्न देशों के उत्पादकों से सीधे संपर्क स्थापित किए और कूटनीतिक माध्यमों का उपयोग करके उर्वरकों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयास किए। मंत्रालय का दावा है कि इन कदमों की बदौलत देश में उर्वरकों की उपलब्धता पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ा है।
सरकार ने किसानों को राहत देते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि मौजूदा खरीफ सीजन के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध हैं। किसानों को किसी प्रकार की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा और आवश्यकतानुसार सभी प्रमुख उर्वरक उपलब्ध कराए जाएंगे।
उर्वरक सब्सिडी के मोर्चे पर भी केंद्र सरकार किसानों को बड़ी राहत दे रही है। वैश्विक बाजार में यूरिया और डीएपी की कीमतों में भारी वृद्धि के बावजूद किसानों के लिए खुदरा कीमतों को स्थिर रखा गया है। वर्तमान में 45 किलोग्राम का यूरिया बैग 266.50 रुपये की सब्सिडी वाली दर पर उपलब्ध है, जबकि इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत 4,100 रुपये प्रति बैग से अधिक बताई जा रही है। इसी प्रकार 50 किलोग्राम डीएपी का बैग किसानों को 1,350 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि वैश्विक बाजार में इसकी कीमत लगभग 5,000 रुपये प्रति बैग है।
कुल मिलाकर, नए यूरिया संयंत्रों की शुरुआत, बढ़ती उत्पादन क्षमता, मजबूत आपूर्ति प्रबंधन और व्यापक सब्सिडी समर्थन के माध्यम से भारत सरकार देश की उर्वरक सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। इससे न केवल किसानों को लाभ मिलेगा बल्कि देश की कृषि व्यवस्था भी अधिक आत्मनिर्भर और स्थिर बन सकेगी।

