भारतीय कृषि ने पिछले वर्षों में उत्पादन और विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन भविष्य में इस प्रगति को बनाए रखने के लिए मिट्टी की सेहत, जल संसाधनों और पूरे कृषि इकोसिस्टम को मजबूत करना जरूरी है। इसी दिशा में पुनर्योजी कृषि भारतीय खेती के लिए एक महत्वपूर्ण और भविष्योन्मुखी विकल्प बनकर सामने आ रही है। इसका उद्देश्य केवल वर्तमान कृषि व्यवस्था को बनाए रखना नहीं, बल्कि मिट्टी की जीवन शक्ति को बहाल करना, जैव-विविधता को बढ़ाना, संसाधनों की दक्षता सुधारना और खेती को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक मजबूत बनाना है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक देश में प्राकृतिक खेती के 18,786 क्लस्टर बनाए जा चुके थे, जो 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हैं और इनमें 18.19 लाख किसान शामिल हैं। वहीं, मई 2026 तक ‘हर बूंद, अधिक फसल’ यानी पर ड्रॉप मोर क्रॉप योजना के तहत लगभग 109 लाख हेक्टेयर भूमि को कवर किया जा चुका था। इसके अलावा, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत मार्च 2026 तक 25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए गए हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में खेती को अधिक संसाधन-कुशल, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ बनाने की दिशा में व्यापक प्रयास चल रहे हैं।
कृषि विकास के साथ मिट्टी की सेहत जरूरी
भारत की कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों ने वित्त वर्ष 2016 से वित्त वर्ष 2025 के बीच 4.45 प्रतिशत की दशकीय वृद्धि दर्ज की, जो पिछले दशकों में सबसे अधिक रही। यह उपलब्धि किसानों की मेहनत और कृषि क्षेत्र की मजबूती को दर्शाती है। हालांकि, लगातार बढ़ती उत्पादकता के साथ यह भी जरूरी है कि कृषि के प्राकृतिक आधार को मजबूत रखा जाए।
लगातार कई वर्षों तक सघन खेती, रासायनिक इनपुट के अत्यधिक उपयोग और अनियमित वर्षा जैसी परिस्थितियों का असर मिट्टी की उर्वरता पर पड़ सकता है। कई क्षेत्रों में किसानों को पहले की तुलना में समान उत्पादन हासिल करने के लिए अधिक इनपुट की आवश्यकता महसूस होती है। दूसरी ओर, लू, सूखा और अत्यधिक वर्षा जैसी मौसमी परिस्थितियां भी फसल उत्पादन के लिए चुनौती बन रही हैं। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए मिट्टी की गिरती सेहत का सीधा संबंध बढ़ती लागत और फसल उत्पादन की अनिश्चितता से है।
ऐसे समय में पुनर्योजी कृषि मिट्टी की जीवन शक्ति को फिर से बढ़ाने, इकोसिस्टम की कार्यक्षमता मजबूत करने और जलवायु परिवर्तनशीलता से निपटने की क्षमता बढ़ाने का रास्ता प्रदान करती है। इसका व्यापक उद्देश्य भारतीय कृषि के आधार को पुनर्जीवित करते हुए किसानों की समृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन दोनों को मजबूत करना है।
क्या है पुनर्योजी कृषि?
पुनर्योजी कृषि एक समग्र कृषि पद्धति है, जिसमें मृदा स्वास्थ्य और जैव-विविधता को प्राथमिकता दी जाती है। इसका उद्देश्य केवल वर्तमान स्थिति को बनाए रखना नहीं, बल्कि मिट्टी और इकोसिस्टम की स्थिति को लगातार बेहतर बनाना है।
स्वस्थ मिट्टी बेहतर उत्पादन के साथ-साथ कार्बन भंडारण और जैव-विविधता को भी बढ़ावा देती है। पुनर्योजी कृषि मिट्टी की सेहत में सक्रिय सुधार, जैव-विविधता के संरक्षण और कृषि इकोसिस्टम की सुदृढ़ता को मजबूत करने पर जोर देती है।
इस पद्धति के प्रमुख सिद्धांतों में मिट्टी के साथ कम से कम छेड़छाड़, बारहमासी फसलों की जीवित जड़ों की सुरक्षा, मिट्टी की सतह पर आवरण बनाए रखना, पशुधन को कृषि प्रणाली से जोड़ना, रासायनिक इनपुट के उपयोग को सीमित करना और जैव-विविधता को बढ़ाना शामिल है।
सूक्ष्म सिंचाई से पानी की बचत और उत्पादन में सुधार
पुनर्योजी और संसाधन-कुशल कृषि में पानी का प्रबंधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ड्रिप, स्प्रिंकलर और फॉगर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियां पानी को सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाती हैं। इससे पानी की बर्बादी कम होती है और पानी के उपयोग की दक्षता बढ़ती है।
खेत के स्तर पर बेहतर जल प्रबंधन किसानों को सूखे और पानी की कमी जैसी परिस्थितियों से निपटने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही फसल उत्पादन को बेहतर बनाने और खेती को आर्थिक रूप से अधिक व्यावहारिक बनाने में भी सूक्ष्म सिंचाई उपयोगी है।
‘हर बूंद, अधिक फसल’ योजना के तहत छोटे और सीमांत किसानों को सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के लिए 55 प्रतिशत, जबकि अन्य किसानों को 45 प्रतिशत आर्थिक सहायता दी जाती है। मई 2026 तक इस योजना के तहत लगभग 109 लाख हेक्टेयर भूमि को कवर किया जा चुका था और इसके लिए 26,325 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता जारी की गई थी।
मशीनीकरण से बढ़ेगी संसाधनों की दक्षता
खेती के मशीनीकरण का उद्देश्य कृषि कार्यों को आसान और समयबद्ध बनाना है। आधुनिक मशीनों और उपकरणों के बेहतर उपयोग से पानी, ईंधन और उर्वरक जैसे संसाधनों की बर्बादी कम की जा सकती है। इससे कार्बन उत्सर्जन घटाने और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में भी मदद मिलती है।
समय पर कृषि कार्य पूरे होने से उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है और खेती पर पड़ने वाला पर्यावरणीय दबाव भी कम किया जा सकता है। इस तरह मशीनीकरण पुनर्योजी कृषि के व्यापक संसाधन-कुशल दृष्टिकोण को मजबूती प्रदान करता है।
संतुलित उर्वरक उपयोग और वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन
मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग बेहद महत्वपूर्ण है। नाइट्रोजन उर्वरक प्रबंधन के माध्यम से नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने और फसल उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इसमें सही उर्वरक का चयन, उसकी सही मात्रा और उचित समय पर उपयोग पर जोर दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त सुपरग्रेन्युलर यूरिया को गहराई में डालने, नाइट्रोजन की स्थिति का आकलन करने के लिए पत्ती रंग चार्ट का इस्तेमाल करने और साइनोबैक्टीरिया तथा लेग्यूम इंटरक्रॉपिंग जैसे जैविक उपायों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जाता है। इन उपायों का उद्देश्य नाइट्रोजन उपयोग दक्षता को बढ़ाना और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम करना है।
प्राकृतिक खेती भी पुनर्योजी कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा
भारत में प्राकृतिक खेती पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर आधारित रसायन-मुक्त कृषि पद्धति के रूप में विकसित हो रही है। इसमें बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी जैसे खेत में तैयार किए जाने वाले जैविक इनपुट का उपयोग किया जाता है।
प्राकृतिक खेती पारंपरिक किस्मों के बीजों के उपयोग और खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाने को भी प्रोत्साहित करती है। कीट प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर तैयार वनस्पति-आधारित मिश्रणों का उपयोग किया जाता है।
इसके साथ ही कवर क्रॉपिंग, मल्टी-क्रॉपिंग, मल्चिंग और मिट्टी में कम से कम हस्तक्षेप जैसी पद्धतियों को अपनाने पर जोर दिया जाता है। फसल प्रणाली में पशुधन को जोड़ने से मिट्टी की सेहत, इकोसिस्टम और किसानों की लागत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना रहती है।
हरी खाद, कवर क्रॉपिंग और मल्चिंग से सुधरेगी मिट्टी
पुनर्योजी कृषि में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन की कई पद्धतियां महत्वपूर्ण हैं। इनमें हरी खाद, कवर क्रॉपिंग और मल्चिंग प्रमुख हैं।
हरी खाद के तहत ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जिन्हें बाद में मिट्टी में मिलाया जाता है। इससे जैव पदार्थ और पोषक तत्व मिट्टी में वापस पहुंचते हैं तथा मिट्टी की उर्वरता और संरचना को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
कवर क्रॉपिंग में मुख्य फसल के बजाय मिट्टी को ढकने के उद्देश्य से फसलें उगाई जाती हैं। इससे मिट्टी का कटाव कम करने, जैव कार्बन बनाए रखने और पोषक तत्वों के चक्र को बेहतर करने में सहायता मिलती है।
वहीं, मल्चिंग में पत्तियों, पुआल और अन्य जैविक अवशेषों से मिट्टी की सतह को ढका जाता है। इससे नमी बनाए रखने, मिट्टी के तापमान को नियंत्रित करने और खरपतवार को रोकने में मदद मिलती है।
एकीकृत कृषि प्रणाली से बढ़ेंगे आय के अवसर
एकीकृत कृषि प्रणाली यानी आईएफएस खेती का ऐसा मॉडल है जिसमें विभिन्न कृषि गतिविधियों को एक ही प्रणाली में जोड़ा जाता है। इसमें फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, मत्स्यपालन, बागवानी, कृषि-वानिकी और मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं।
आईएफएस में इंटरक्रॉपिंग, क्रॉप रोटेशन, मल्टी-क्रॉपिंग और मिश्रित खेती जैसी पद्धतियां संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद करती हैं। साथ ही, यदि एक फसल को नुकसान होता है तो अन्य गतिविधियों से आय का स्रोत बना रह सकता है। इस तरह यह प्रणाली किसानों के जोखिम को कम करने और आजीविका में विविधता लाने में मदद करती है।
वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम के तहत क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण से आईएफएस को बढ़ावा दिया जाता है। किसानों को एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने के लिए प्रति परिवार 30,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है, जबकि प्रशिक्षण और क्षमता विकास के लिए प्रत्येक क्लस्टर को अतिरिक्त 10,000 रुपये दिए जाते हैं। दिसंबर 2025 तक इस कार्यक्रम के तहत 9.53 लाख हेक्टेयर भूमि और 15.73 लाख किसान शामिल किए जा चुके थे।
कृषि-वानिकी से मिट्टी, आय और पर्यावरण को लाभ
कृषि-वानिकी में पेड़ों और कृषि फसलों को एक साथ जोड़कर अधिक टिकाऊ और लाभदायक खेती प्रणाली तैयार करने का प्रयास किया जाता है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर मिल सकते हैं, साथ ही मिट्टी की नमी बनाए रखने, स्थानीय तापमान नियंत्रित करने और कार्बन संग्रहण में मदद मिलती है।
वर्षा आधारित क्षेत्रों में कृषि-वानिकी बंजर भूमि के पुनरुद्धार में भी उपयोगी हो सकती है। इसके माध्यम से अनियमित वर्षा के प्रभावों को कम करने और कृषि क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलती है।
कृषि-वानिकी घटक के तहत नर्सरी विकास, गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री, टिश्यू कल्चर इकाइयों, कौशल विकास, अनुसंधान एवं विकास तथा जागरूकता जैसी गतिविधियों को समर्थन दिया जा रहा है। 2025-26 में 31 अक्टूबर 2025 तक 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 78.31 करोड़ रुपये मंजूर किए गए और 135 नई नर्सरियां स्थापित की गईं।
जलवायु-अनुकूल खेती समय की जरूरत
बदलती जलवायु परिस्थितियों में किसानों के लिए ऐसी कृषि प्रणालियां जरूरी हैं जो सूखा, बाढ़, अनियमित वर्षा और अन्य मौसमी झटकों का सामना कर सकें। जलवायु-अनुकूल कृषि में संतुलित पोषक तत्व उपयोग, प्रभावी कीट प्रबंधन, पानी का कुशल उपयोग, मिट्टी की नमी संरक्षण और उचित भूमि तैयारी जैसी रणनीतियों पर जोर दिया जाता है।
इसके अलावा जल साझा करने वाले समूह, बीज और चारा व्यवस्था, सामुदायिक नर्सरी तथा सामूहिक विपणन जैसी व्यवस्थाएं भी किसानों की सामूहिक क्षमता बढ़ाने में मदद करती हैं।
पुनर्योजी कृषि से पर्यावरण को कई फायदे
पुनर्योजी कृषि का सबसे महत्वपूर्ण लाभ मृदा पुनर्स्थापन है। इससे मिट्टी में जैव पदार्थ बढ़ाने, मिट्टी की संरचना सुधारने और दीर्घकालिक उर्वरता बढ़ाने में मदद मिलती है।
इसके अलावा यह जैव-विविधता के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करती है। परागणकों, लाभकारी कीटों और मिट्टी के सूक्ष्मजीवों के लिए बेहतर वातावरण बनने से पूरे कृषि इकोसिस्टम का संतुलन मजबूत हो सकता है।
स्वस्थ मिट्टी अधिक पानी धारण कर सकती है और सतही बहाव को कम कर सकती है। इससे मिट्टी का कटाव और जल निकायों में तलछट व प्रदूषकों का प्रवाह कम करने में सहायता मिलती है। पुनर्योजी प्रणालियां कार्बन को अवशोषित और संग्रहित करने में भी योगदान देती हैं।
किसानों की आय और रोजगार के लिए भी महत्वपूर्ण
पुनर्योजी कृषि का लाभ केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। स्वस्थ मिट्टी से सिंथेटिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे खेती की लागत घटाने और उत्पादन को अधिक स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा पुनर्योजी कृषि के विस्तार से खेती, कृषि सलाह, तकनीक और इकोलॉजिकल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। जलवायु और बाजार में बदलावों से निपटने के लिए विविध कृषि प्रणालियां किसानों की क्षमता को भी मजबूत कर सकती हैं।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से किसानों को प्रोत्साहन
सरकार ने वर्ष 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (एनएमएनएफ) शुरू किया। इसका उद्देश्य किसानों को धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने के लिए आवश्यक सहायता इकोसिस्टम उपलब्ध कराना है।
इस मिशन के तहत प्रति किसान एक एकड़ भूमि पर दो वर्षों तक प्रति वर्ष 4,000 रुपये का आउटपुट आधारित प्रोत्साहन दिया जाता है। किसानों को जीवामृत और बीजामृत जैसे जैव-इनपुट आसानी से उपलब्ध कराने के लिए आवश्यकता के अनुसार 10,000 बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर बनाने की योजना है। प्रत्येक प्राकृतिक खेती क्लस्टर में दो कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन किसानों को मार्गदर्शन देंगे।
5 मार्च 2026 तक देश में 18,786 क्लस्टर बनाए जा चुके थे। इनमें 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र और 18.19 लाख किसान शामिल थे। केवीके, कृषि विश्वविद्यालयों और स्थानीय संस्थानों के माध्यम से 33,676 कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन को प्रशिक्षित किया गया था।
जैविक खेती के लिए भी सरकारी समर्थन
वर्ष 2015 में शुरू की गई परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) देश में जैविक खेती को बढ़ावा देने की प्रमुख पहल है। इसके माध्यम से किसानों को पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियां अपनाने, जैविक प्रमाणन प्राप्त करने और टिकाऊ उत्पादन के लिए बेहतर बाजारों तक पहुंच बनाने में सहायता दी जाती है।
इस योजना के तहत जैविक खेती करने वाले किसानों को तीन वर्षों में प्रति हेक्टेयर 31,500 रुपये की सहायता दी जाती है। 31 अक्टूबर 2025 तक पीकेवीवाई के अंतर्गत कुल 16.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जा चुका था।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड से वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना वर्ष 2015 में शुरू की गई थी। इसके तहत किसानों को उनकी भूमि की वैज्ञानिक जांच के आधार पर प्लॉट-वार मिट्टी की रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाती है। यह कार्ड 12 प्रमुख मानकों के आधार पर मिट्टी की स्थिति का आकलन करता है, जिनमें मैक्रोन्यूट्रिएंट्स, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और मिट्टी के महत्वपूर्ण भौतिक-रासायनिक गुण शामिल हैं।
हर दो वर्ष में जारी होने वाला मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसानों को अपनी मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति समझने में मदद करता है। इसके आधार पर रासायनिक उर्वरकों, जैव-उर्वरकों, जैविक खाद और मिट्टी उपचार के उचित उपयोग के संबंध में फसल-विशेष सलाह दी जाती है।
13 मार्च 2026 तक इस योजना के तहत कुल 25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके थे। संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लगभग 7.17 लाख प्रदर्शन भी आयोजित किए गए और 70,002 कृषि सखियों को मृदा स्वास्थ्य संबंधी सलाह किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित किया गया।
सुदृढ़ भारत के लिए स्वस्थ मिट्टी जरूरी
पुनर्योजी कृषि भारतीय खेती को अधिक टिकाऊ, संसाधन-कुशल और जलवायु-अनुकूल बनाने की दिशा में एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। प्राकृतिक खेती, कृषि-वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई, एकीकृत कृषि प्रणाली, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और वैज्ञानिक मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन जैसे उपाय मिलकर कृषि की दीर्घकालिक नींव को मजबूत कर सकते हैं।
पुनर्योजी कृषि का मूल संदेश यही है कि भविष्य की उत्पादकता केवल अधिक इनपुट इस्तेमाल करने से नहीं, बल्कि मिट्टी की जीवन शक्ति को बनाए रखने और उसे लगातार बेहतर बनाने से सुनिश्चित होगी। स्वस्थ मिट्टी बेहतर जल धारण क्षमता, जैव-विविधता, संसाधन दक्षता और स्थिर उत्पादन का आधार बन सकती है।
सरकार की विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से इन पद्धतियों को किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। जैसे-जैसे अधिक किसान प्राकृतिक खेती, कृषि-वानिकी, सूक्ष्म सिंचाई और एकीकृत खेती जैसी प्रणालियों को अपनाएंगे, भारतीय कृषि के पर्यावरणीय और आर्थिक आधार को और मजबूती मिलने की संभावना है।
आखिरकार, पुनर्योजी कृषि केवल खेती की एक तकनीक नहीं, बल्कि मिट्टी, पानी, जैव-विविधता, किसान की आय और भविष्य की खाद्य सुरक्षा को एक साथ देखने वाला दृष्टिकोण है। स्वस्थ मिट्टी से शुरू होने वाली यह यात्रा अधिक मजबूत खेतों, टिकाऊ उत्पादन और सुरक्षित किसान आजीविका की दिशा में आगे बढ़ सकती है।

