कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखना आज भारतीय कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग के कारण जहां एक ओर मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, वहीं दूसरी ओर खेती की लागत भी लगातार बढ़ रही है। इन चुनौतियों को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–खरपतवार अनुसंधान निदेशालय (भाकृअनुप–डीडब्ल्यूआर), पुणे द्वारा किसानों को वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से एक विशेष किसान–वैज्ञानिक संवाद एवं जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
19 मई 2026 को मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के पाटन विकासखंड स्थित अनुसूचित जाति बहुल रैथरा गांव में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘संतुलित उर्वरक उपयोग’ रहा। कार्यक्रम में किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, पोषक तत्व प्रबंधन और टिकाऊ खेती के उपायों की जानकारी दी गई, ताकि वे कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकें और मिट्टी की सेहत को भी सुरक्षित रख सकें।
मृदा स्वास्थ्य सुधार पर विशेष जोर
कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने बताया कि स्वस्थ मिट्टी ही बेहतर उत्पादन की आधारशिला होती है। यदि किसान लगातार एक ही प्रकार के रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं, तो मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे उत्पादन क्षमता प्रभावित होने लगती है।
विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी कि वे मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करें। इससे फसलों को आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते हैं और उर्वरकों पर होने वाला अनावश्यक खर्च भी कम होता है। वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि संतुलित उर्वरीकरण से न केवल उत्पादन बढ़ता है बल्कि मिट्टी की जैविक गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
समेकित पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी
कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management – INM) रहा। वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। इसके लिए जैविक और प्राकृतिक स्रोतों को भी खेती में शामिल करना आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, जैव उर्वरक और फसल अवशेषों का उचित उपयोग मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने में मदद करता है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता बेहतर होती है और फसलें अधिक स्वस्थ एवं उत्पादक बनती हैं।
हरी खाद और जैव उर्वरकों के लाभ बताए
वैज्ञानिकों ने किसानों को हरी खाद के महत्व के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ढैंचा, सन और अन्य हरी खाद वाली फसलों को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और नाइट्रोजन की उपलब्धता में सुधार होता है।
इसके अलावा जैव उर्वरकों के उपयोग को भी बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि जैव उर्वरक पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी सहायक होते हैं। इनके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
फसल विविधीकरण और दलहनी फसलों का महत्व
कार्यक्रम के दौरान फसल विविधीकरण और फसल चक्र अपनाने के महत्व पर भी चर्चा की गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि लगातार एक ही फसल की खेती करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और कीट-रोगों का प्रकोप भी बढ़ सकता है।
इस समस्या से बचने के लिए किसानों को दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने की सलाह दी गई। दलहनी फसलें वातावरण से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता में प्राकृतिक रूप से सुधार होता है। साथ ही किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी प्राप्त होता है।
खरपतवार प्रबंधन को बताया उत्पादन बढ़ाने का महत्वपूर्ण उपाय
भाकृअनुप–डीडब्ल्यूआर के वैज्ञानिकों ने फसल उत्पादन प्रणालियों में प्रभावी खरपतवार प्रबंधन की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि खरपतवार फसलों के साथ पोषक तत्वों, पानी और प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे उत्पादन में कमी आ सकती है।
विशेषज्ञों ने किसानों को खरपतवार नियंत्रण की विभिन्न वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी और बताया कि समय पर नियंत्रण से पोषक तत्वों की हानि को कम किया जा सकता है। इससे उर्वरकों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होता है और फसलों की वृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
किसानों ने दिखाई गहरी रुचि
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू किसान–वैज्ञानिक संवाद रहा, जिसमें किसानों ने खुलकर अपने अनुभव और समस्याएं साझा कीं। किसानों ने उर्वरक उपयोग, मिट्टी की घटती उर्वरता, फसल उत्पादन और खरपतवार नियंत्रण से जुड़े कई प्रश्न वैज्ञानिकों से पूछे।
वैज्ञानिकों ने किसानों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्हें स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक सुझाव दिए। किसानों ने भी संतुलित उर्वरीकरण और समेकित पोषक तत्व प्रबंधन तकनीकों को अपनाने में गहरी रुचि दिखाई।
महिला किसानों की भी रही सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में गांव के सरपंच सहित कुल 34 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 22 पुरुष और 12 महिला किसान शामिल थीं। महिला किसानों की सक्रिय भागीदारी कार्यक्रम की विशेष उपलब्धि रही। विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है और टिकाऊ कृषि तकनीकों को अपनाने में उनकी भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
भाकृअनुप–खरपतवार अनुसंधान निदेशालय द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम केवल जागरूकता तक सीमित नहीं था, बल्कि किसानों को वैज्ञानिक खेती की दिशा में प्रेरित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान संतुलित उर्वरक उपयोग, समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, हरी खाद, जैव उर्वरकों और फसल विविधीकरण जैसी तकनीकों को अपनाते हैं, तो कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी और पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है।
कृषि क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों के बीच ऐसे कार्यक्रम किसानों को वैज्ञानिक जानकारी से जोड़ने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इससे न केवल किसानों की आय में सुधार होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्वस्थ और उपजाऊ मिट्टी संरक्षित रह सकेगी।


