खरीफ सीजन 2026 में देशभर में फसलों की बुवाई का कार्य तेजी से जारी है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार 17 जुलाई 2026 तक देश में 658.19 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हो चुकी है। हालांकि यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 42.28 लाख हेक्टेयर कम है। पिछले वर्ष इसी अवधि तक 700.47 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई दर्ज की गई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष मानसून की धीमी शुरुआत और कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा के कारण बुवाई की रफ्तार प्रभावित हुई है। हालांकि दक्षिण-पश्चिम मानसून अब पूरे देश में सक्रिय हो चुका है, जिससे आने वाले दिनों में बुवाई का क्षेत्र तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।
धान की बुवाई लगभग पिछले वर्ष के बराबर
देश की सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल धान की बुवाई 166.41 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 167.83 लाख हेक्टेयर थी। यानी धान के रकबे में केवल 1.41 लाख हेक्टेयर की मामूली कमी दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि मानसून की प्रगति के साथ धान की रोपाई सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रही है।
दलहन फसलों में सबसे अधिक गिरावट
दलहन फसलों की कुल बुवाई 69.23 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले वर्ष के 81.52 लाख हेक्टेयर की तुलना में 12.29 लाख हेक्टेयर कम है।
प्रमुख दलहनों की स्थिति इस प्रकार रही—
- अरहर : 24.80 लाख हेक्टेयर (5.36 लाख हेक्टेयर की कमी)
- उड़द : 13.51 लाख हेक्टेयर (0.85 लाख हेक्टेयर की कमी)
- मूंग : 23.98 लाख हेक्टेयर (2.97 लाख हेक्टेयर की कमी)
- मोठ : 4.62 लाख हेक्टेयर (2.87 लाख हेक्टेयर की कमी)
दलहन क्षेत्र में आई यह गिरावट आगामी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, हालांकि कृषि मंत्रालय का मानना है कि मानसून की स्थिति सुधरने के साथ बुवाई में तेजी आने की संभावना है।
श्री अन्न एवं मोटे अनाज की बुवाई भी घटी
सरकार द्वारा पोषक अनाज के रूप में बढ़ावा दिए जा रहे श्री अन्न (मोटे अनाज) की बुवाई भी इस वर्ष पिछले साल की तुलना में कम रही है।
अब तक 119.03 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है, जबकि पिछले वर्ष यह 134.09 लाख हेक्टेयर थी। यानी 15.06 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।
इस श्रेणी में—
- बाजरा : 39.98 लाख हेक्टेयर (9.08 लाख हेक्टेयर कम)
- मक्का : 67.89 लाख हेक्टेयर (3.61 लाख हेक्टेयर कम)
- ज्वार : 8.74 लाख हेक्टेयर (1.25 लाख हेक्टेयर कम)
- रागी : 1.06 लाख हेक्टेयर (0.40 लाख हेक्टेयर कम)
तिलहन फसलों का रकबा भी घटा
तिलहन फसलों की बुवाई 147.09 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक 155.72 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर किया गया था। यानी 8.63 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।
प्रमुख तिलहन फसलों की स्थिति—
- सोयाबीन : 106.02 लाख हेक्टेयर (5.02 लाख हेक्टेयर कम)
- मूंगफली : 34.52 लाख हेक्टेयर (3.17 लाख हेक्टेयर कम)
- तिल : 5.12 लाख हेक्टेयर (0.84 लाख हेक्टेयर कम)
हालांकि सूरजमुखी की बुवाई में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कपास की बुवाई में भी कमी
देश में कपास की बुवाई 92.53 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले वर्ष यह 98.40 लाख हेक्टेयर थी। इस प्रकार कपास के रकबे में 5.87 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कई कपास उत्पादक राज्यों में देर से हुई बारिश का असर बुवाई पर पड़ा है।
गन्ना और जूट में बढ़ा क्षेत्र
जहां अधिकांश खरीफ फसलों के रकबे में कमी दर्ज की गई है, वहीं गन्ना और जूट एवं मेस्ता की बुवाई में बढ़ोतरी देखी गई है।
- गन्ना : 57.58 लाख हेक्टेयर (पिछले वर्ष 56.72 लाख हेक्टेयर, यानी 0.86 लाख हेक्टेयर अधिक)
- जूट एवं मेस्ता : 6.32 लाख हेक्टेयर (0.13 लाख हेक्टेयर अधिक)
इन दोनों फसलों में पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर प्रगति दर्ज की गई है।
सामान्य क्षेत्रफल की तुलना में अभी काफी दूरी
यदि पिछले पांच वर्षों (2020-21 से 2024-25) के औसत सामान्य क्षेत्रफल को देखा जाए तो धान, दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और कपास सहित अधिकांश प्रमुख फसलों में अभी भी बुवाई सामान्य स्तर से नीचे बनी हुई है। हालांकि कृषि मंत्रालय का कहना है कि मानसून अब पूरे देश में सक्रिय हो चुका है और आगामी सप्ताहों में बुवाई में तेजी आने की पूरी संभावना है।
मानसून की प्रगति से बढ़ी उम्मीदें
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई के दूसरे पखवाड़े में मानसून के सक्रिय होने से किसानों को बुवाई के लिए बेहतर परिस्थितियां मिल रही हैं। यदि आने वाले दिनों में वर्षा सामान्य बनी रहती है तो खरीफ फसलों का कुल रकबा तेजी से बढ़ सकता है और पिछले वर्ष के स्तर के करीब पहुंचने की संभावना है।
सरकार भी लगातार राज्यों के साथ समन्वय बनाए हुए है तथा उर्वरकों, बीजों और कृषि सलाह की उपलब्धता सुनिश्चित कर रही है, ताकि किसान समय पर बुवाई पूरी कर सकें और खरीफ उत्पादन पर मौसम का प्रतिकूल प्रभाव न्यूनतम रहे।

