भारत में मॉनसून सीजन 2026 (Monsoon Season 2026) की शुरुआत उम्मीद के अनुसार मजबूत नहीं रही है। 21 जून 2026 तक देश में औसतन केवल 46 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि तक लगभग 84.4 मिमी बारिश होनी चाहिए। यानी अब तक बारिश में करीब 46% की कमी देखी जा रही है। शुरुआती मॉनसून की यह कमजोरी किसानों, खरीफ फसलों, जल स्रोतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का कारण बन गई है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने इस साल केरल में 4 जून 2026 को दस्तक दी, जो सामान्य तारीख से देरी से था। इसके बाद मॉनसून की गति कई हिस्सों में धीमी रही। IMD के मॉनसून अपडेट में 23 जून के आसपास तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने की संभावना जताई गई थी।
शुरुआती मॉनसून कमजोर, किसानों की चिंता बढ़ी
भारत की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर है। खासकर खरीफ सीजन में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, बाजरा, अरहर और मूंग जैसी फसलों की बुवाई बारिश के समय और मात्रा पर निर्भर करती है। जब जून में बारिश कम होती है, तो खेत की नमी घट जाती है और किसान बुवाई को लेकर असमंजस में आ जाते हैं।
देश के कई हिस्सों में किसानों ने खेत तैयार कर लिए हैं, लेकिन पर्याप्त बारिश न होने के कारण बुवाई शुरू करने में देरी हो रही है। जहां बुवाई हो चुकी है, वहां अंकुरण और पौधों की शुरुआती वृद्धि पर असर पड़ सकता है। कमजोर बारिश से किसानों को दोबारा बुवाई का खर्च भी उठाना पड़ सकता है।
अल-नीनो बना सबसे बड़ा खतरा
इस बार कमजोर मॉनसून के पीछे सबसे बड़ा कारण अल-नीनो को माना जा रहा है। अल-नीनो तब बनता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का सतही पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है। भारत में अल-नीनो अक्सर मॉनसून को कमजोर करता है और बारिश की मात्रा घटा सकता है।
जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार, 2026 के मॉनसून पर अल-नीनो की छाया साफ दिखाई दे रही है। कुछ जलवायु आकलनों में 2026 में सामान्य से कम मॉनसून की आशंका जताई गई है, जिसका प्रमुख कारण प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल-नीनो स्थिति को माना गया है।
IOD न्यूट्रल, इसलिए राहत नहीं मिल रही
मॉनसून को प्रभावित करने वाला दूसरा महत्वपूर्ण कारक इंडियन ओशन डाईपोल यानी IOD है। जब IOD पॉजिटिव होता है, तो यह कई बार अल-नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कम करने में मदद करता है। लेकिन इस समय IOD न्यूट्रल बताया जा रहा है, यानी हिंद महासागर की स्थिति मॉनसून को अतिरिक्त मजबूती नहीं दे पा रही है।
सरल भाषा में समझें तो इस बार अल-नीनो बारिश को कमजोर कर रहा है, लेकिन IOD उसे संतुलित करने में मदद नहीं कर रहा। यही वजह है कि मॉनसून की चाल कई क्षेत्रों में सुस्त दिख रही है।
MJO भी साथ नहीं दे रहा
मेडेन-जूलियन ऑसिलेशन यानी MJO भी मॉनसून की सक्रियता में भूमिका निभाता है। MJO भूमध्य रेखा के आसपास बादलों और वर्षा की गतिविधियों को प्रभावित करता है। जब MJO भारतीय महासागर क्षेत्र में अनुकूल स्थिति में होता है, तो मॉनसून को तेजी मिलती है। लेकिन मौजूदा स्थिति में MJO भी मॉनसून को मजबूत सपोर्ट नहीं दे रहा है।
इसी कारण जून के शुरुआती तीन सप्ताह में बारिश का वितरण असमान रहा है। कुछ हिस्सों में भारी बारिश हुई, लेकिन बड़े भूभाग पर बारिश सामान्य से काफी कम रही।
कई राज्यों में बारिश की कमी, कुछ जगह भारी बारिश की चेतावनी
मॉनसून की कमजोरी पूरे देश में एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में बारिश की कमी बहुत अधिक है, जबकि पूर्वोत्तर भारत जैसे क्षेत्रों में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी भी जारी की गई है। IMD ने 21 जून को जारी अपडेट में 25 जून तक पूर्वोत्तर भारत में और 22 जून तक उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम में बहुत भारी से अत्यधिक भारी बारिश की संभावना जताई थी।
इसका मतलब है कि देश में मॉनसून कमजोर जरूर है, लेकिन बारिश का वितरण असंतुलित है। कहीं सूखे जैसी स्थिति बन रही है, तो कहीं अचानक भारी बारिश से बाढ़ और जलभराव का खतरा पैदा हो सकता है।
धान की रोपाई पर सबसे ज्यादा असर
कम बारिश का सीधा असर धान की खेती पर पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना जैसे राज्यों में धान की बुवाई और रोपाई मॉनसून पर निर्भर करती है।
धान की नर्सरी और रोपाई के लिए खेत में पर्याप्त पानी जरूरी होता है। अगर जून के अंत तक अच्छी बारिश नहीं होती, तो रोपाई में देरी हो सकती है। देरी से रोपाई होने पर फसल की अवधि कम हो जाती है और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में किसानों को वैकल्पिक फसल या कम पानी वाली धान किस्मों पर विचार करना पड़ सकता है।
कपास, सोयाबीन और दलहन फसलों के लिए भी चुनौती
कपास और सोयाबीन जैसी फसलें शुरुआती नमी पर निर्भर करती हैं। कम बारिश होने पर बीज का अंकुरण कमजोर हो सकता है। अगर किसान जल्दबाजी में बुवाई कर देते हैं और बाद में बारिश रुक जाती है, तो पौधे सूख सकते हैं।
दलहन फसलों जैसे अरहर, मूंग और उड़द के लिए भी शुरुआती नमी जरूरी होती है। हालांकि ये फसलें धान की तुलना में कम पानी मांगती हैं, लेकिन अंकुरण के समय बारिश न मिले तो खेत में खालीपन बढ़ सकता है।
जल स्रोतों पर भी बढ़ेगा दबाव
मॉनसून की शुरुआती कमी केवल खेती तक सीमित नहीं है। इसका असर तालाब, नदियों, झीलों, भूजल और पेयजल स्रोतों पर भी पड़ सकता है। जून की बारिश जल स्रोतों को रिचार्ज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर बारिश कमजोर रही, तो ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी, सिंचाई और पशुओं के लिए पानी की समस्या बढ़ सकती है।
पहाड़ी और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में बारिश की कमी जल संकट को और गंभीर बना सकती है। उत्तराखंड में भी मॉनसून की देरी के कारण बारिश की कमी दर्ज की गई है। 22 जून 2026 तक राज्य में बारिश की कमी 32% तक बताई गई, जिससे कृषि और जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ी है।
कमजोर मॉनसून के कारण कई हिस्सों में गर्मी और लू जैसे हालात बने हुए हैं। विदर्भ और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में लू का अलर्ट भी जारी किया गया। कमजोर बारिश और अधिक तापमान का संयोजन फसलों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इससे मिट्टी की नमी तेजी से कम होती है और सिंचाई की जरूरत बढ़ जाती है।
किसानों को क्या करना चाहिए?
मौजूदा स्थिति में किसानों को जल्दबाजी में बुवाई करने से बचना चाहिए। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई है, वहां कृषि वैज्ञानिकों और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह लेकर ही बुवाई करें। धान की रोपाई के लिए खेत में स्थायी नमी का इंतजार करना बेहतर रहेगा।
कम पानी वाले क्षेत्रों में किसान बाजरा, मक्का, अरहर, मूंग, उड़द, तिल और ज्वार जैसी फसलों पर विचार कर सकते हैं। जहां धान जरूरी है, वहां कम अवधि वाली और सूखा सहनशील किस्मों का चयन फायदेमंद हो सकता है।
किसानों को खेत में मेड़बंदी, वर्षा जल संचयन और नमी संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए। खेत की जुताई और बुवाई की योजना स्थानीय बारिश के अनुसार बनानी चाहिए। अगर बीज बोने के बाद बारिश रुक जाए, तो दोबारा बुवाई की स्थिति से बचने के लिए मौसम पूर्वानुमान पर नजर रखना जरूरी है।
सरकार और कृषि विभाग की भूमिका अहम
मॉनसून की कमजोर शुरुआत को देखते हुए राज्य सरकारों और कृषि विभागों को अलर्ट रहना होगा। किसानों को समय पर मौसम सलाह, फसल चयन की जानकारी, बीज उपलब्धता और सिंचाई सहायता देना जरूरी है। जिन जिलों में बारिश की कमी ज्यादा है, वहां वैकल्पिक फसल योजना और सूखा प्रबंधन रणनीति लागू करनी चाहिए।
कृषि विज्ञान केंद्रों को गांव स्तर पर सलाह जारी करनी चाहिए, ताकि किसान सही समय पर सही निर्णय ले सकें। साथ ही जल संरक्षण, तालाब सफाई, खेत तालाब और सूक्ष्म सिंचाई जैसी योजनाओं पर तेजी से काम करना होगा।
आगे मॉनसून सुधर सकता है, लेकिन सतर्कता जरूरी
IMD के अनुसार, मॉनसून आने वाले दिनों में कुछ और राज्यों में आगे बढ़ सकता है। तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में मॉनसून की प्रगति की संभावना जताई गई थी।
हालांकि शुरुआती कमी का मतलब यह नहीं कि पूरा सीजन खराब ही रहेगा। कई बार मॉनसून जुलाई और अगस्त में सक्रिय होकर कमी की भरपाई कर देता है। लेकिन अल-नीनो की मौजूदगी को देखते हुए किसानों और नीति-निर्माताओं को सतर्क रहना होगा।
निष्कर्ष
भारत में 2026 का मॉनसून कमजोर शुरुआत के साथ आगे बढ़ रहा है। 21 जून तक 46% कम बारिश ने खेती, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अल-नीनो, न्यूट्रल IOD और कमजोर MJO जैसी परिस्थितियां मॉनसून को प्रभावित कर रही हैं।
आने वाले दो से तीन सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण होंगे। अगर जुलाई में बारिश सक्रिय होती है, तो खरीफ फसलों को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर कमी जारी रही, तो धान, कपास, सोयाबीन और दलहन की बुवाई प्रभावित हो सकती है। ऐसे में किसानों को मौसम आधारित खेती, कम पानी वाली फसलें और जल संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी।

