क्षेत्र की सहकारी समिति में बुधवार को आयोजित पीएम-प्रणाम संगोष्ठी किसानों के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक साबित हुई। इस कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने किसानों को आधुनिक खेती के साथ-साथ जैविक उत्पादन, मृदा परीक्षण और मिट्टी के स्वास्थ्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय किसानों ने भाग लिया और नई तकनीकों के बारे में जानकारी प्राप्त की।
संगोष्ठी की अध्यक्षता सहकारी समिति के अध्यक्ष ने की, जबकि मंच पर मौजूद कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को खेती की बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को ढालने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आज के समय में केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक तरीकों और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना बेहद जरूरी है।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने जैविक खेती के महत्व पर विशेष जोर दिया। उन्होंने बताया कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से जहां एक ओर उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित होती है, वहीं दूसरी ओर मिट्टी की उर्वरता भी धीरे-धीरे कम हो जाती है। इसके विपरीत, जैविक खेती अपनाने से न केवल मिट्टी की सेहत बेहतर होती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता और बाजार में उसकी मांग भी बढ़ती है।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को मृदा परीक्षण (सॉइल टेस्टिंग) के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बिना मिट्टी की जांच के उर्वरकों का उपयोग करना कई बार नुकसानदायक हो सकता है। मृदा परीक्षण के जरिए यह पता चलता है कि खेत की मिट्टी में किन पोषक तत्वों की कमी है और किनकी अधिकता है। इसके आधार पर किसान संतुलित उर्वरकों का प्रयोग कर सकते हैं, जिससे लागत कम होती है और उत्पादन बेहतर मिलता है।
इसके अलावा, कार्यक्रम में प्राकृतिक खाद, वर्मी-कम्पोस्ट और हरी खाद के उपयोग पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि ये सभी विकल्प न केवल सस्ते हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित हैं। उन्होंने किसानों को अपने खेतों में इन तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
संगोष्ठी के दौरान किसानों ने भी अपने अनुभव साझा किए और विशेषज्ञों से सवाल पूछे। कई किसानों ने बताया कि वे धीरे-धीरे जैविक खेती की ओर रुख कर रहे हैं और उन्हें इसके सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। विशेषज्ञों ने किसानों की समस्याओं को ध्यानपूर्वक सुना और उन्हें व्यावहारिक समाधान सुझाए।
कार्यक्रम के अंत में किसानों को यह संदेश दिया गया कि “स्वस्थ मिट्टी ही समृद्ध खेती की आधारशिला है।” यदि किसान समय-समय पर मृदा परीक्षण कराते हैं और जैविक तरीकों को अपनाते हैं, तो वे न केवल अपनी आय बढ़ा सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपजाऊ भूमि सुरक्षित रख सकते हैं।
कुल मिलाकर, बसोली में आयोजित यह संगोष्ठी किसानों के लिए नई सोच और तकनीक को अपनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई, जो क्षेत्र में टिकाऊ और लाभकारी कृषि को बढ़ावा देने में सहायक बनेगी।
