देश में अल नीनो और कमजोर मानसून की संभावित स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन के लिए व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को कम करने और किसानों की आय एवं आजीविका को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने बहु-स्तरीय रणनीति तैयार की है। इसी क्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों के कृषि मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, भारतीय मौसम विभाग (IMD), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) तथा अन्य संबंधित संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की।
बैठक के दौरान देशभर में मानसून की स्थिति, खरीफ फसलों की बुवाई, जल उपलब्धता, कृषि इनपुट, बीज एवं उर्वरकों की आपूर्ति तथा किसानों की वित्तीय सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की गई। केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी संकट का इंतजार नहीं कर रही, बल्कि संभावित चुनौतियों से पहले ही तैयारी कर रही है ताकि किसानों को न्यूनतम नुकसान हो।
कमजोर मानसून की आशंका और कृषि पर संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष मानसून की प्रगति सामान्य वर्षों की तुलना में धीमी रही है। कई क्षेत्रों में वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने की आशंका है। विशेष रूप से वे क्षेत्र अधिक संवेदनशील माने जा रहे हैं जहां खेती मुख्य रूप से वर्षा आधारित है और सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं।
कृषि मंत्रालय का मानना है कि यदि समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो धान, मक्का, सोयाबीन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। ऐसे में किसानों को वैकल्पिक फसल विकल्प, जल संरक्षण और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराना अत्यंत आवश्यक है।
315 जिलों की पहचान, प्राथमिकता के आधार पर रणनीति
केंद्र सरकार ने वैज्ञानिक आंकड़ों और मौसम पूर्वानुमानों के आधार पर देश के 315 जिलों को संभावित रूप से संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है। इनमें ऐसे जिले शामिल हैं जहां सिंचाई का दायरा सीमित है और वर्षा पर निर्भरता अधिक है।
इन जिलों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी में वे जिले हैं जहां सिंचाई की उपलब्धता बहुत कम है और जोखिम अधिक है। दूसरी श्रेणी में मध्यम जोखिम वाले जिले शामिल किए गए हैं, जबकि तीसरी श्रेणी में वे क्षेत्र हैं जहां सिंचाई व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर है।
सरकार का लक्ष्य प्रत्येक जिले की स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कार्य योजना तैयार करना है ताकि किसी एक नीति के बजाय क्षेत्र विशेष की जरूरतों के अनुसार निर्णय लिए जा सकें।
जिला कृषि आकस्मिकता योजनाओं को बनाया जाएगा प्रभावी
संभावित संकट से निपटने के लिए सभी जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएं तैयार की गई हैं। इन योजनाओं में स्थानीय जलवायु, मिट्टी की स्थिति, प्रमुख फसलों, जल संसाधनों और जोखिम कारकों को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक रणनीतियां निर्धारित की गई हैं।
इन योजनाओं के तहत किसानों को यह जानकारी दी जाएगी कि वर्षा में देरी होने पर कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं, कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली किस्में कौन-सी हैं तथा किस प्रकार जल और संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है।
सरकार ने राज्यों और जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि इन योजनाओं को केवल कागजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इन्हें वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने की तैयारी की जाए।
जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता
अल नीनो की आशंका के बीच जल संरक्षण सरकार की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया है कि जल संचयन और संरक्षण से जुड़ी सभी संरचनाओं को मजबूत किया जाए।
तालाबों, चेक डैम, स्टॉप डैम, खेत तालाब, नालों और अन्य जल संरचनाओं की मरम्मत और सफाई का कार्य तेज करने पर जोर दिया गया है। ग्रामीण विकास योजनाओं और मनरेगा के माध्यम से भी जल संरक्षण कार्यों को प्राथमिकता देने की योजना बनाई गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो उपलब्ध जल संसाधनों का कुशल प्रबंधन कृषि उत्पादन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
कम अवधि और कम पानी वाली फसलों पर जोर
सरकार किसानों को ऐसी फसलों की ओर प्रोत्साहित कर रही है जो कम समय में तैयार हो जाती हैं और जिनकी जल आवश्यकता अपेक्षाकृत कम होती है।
दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों को इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इसके अलावा किसानों को मिश्रित खेती और फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह दी जा रही है ताकि किसी एक फसल पर निर्भरता कम हो सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि विविधीकरण से जोखिम कम होता है और किसानों की आय के स्रोत भी बढ़ते हैं। यदि एक फसल प्रभावित होती है तो दूसरी फसल से आर्थिक नुकसान की भरपाई की जा सकती है।
बीज और उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता
खरीफ सीजन को देखते हुए केंद्र सरकार ने बीज और उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रबंध किए हैं। संभावित रूप से प्रभावित जिलों के लिए अतिरिक्त बीज भंडार सुरक्षित रखा गया है ताकि आवश्यकता पड़ने पर किसानों को तुरंत सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
उर्वरकों की आपूर्ति की भी लगातार निगरानी की जा रही है। कृषि मंत्रालय का कहना है कि यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता संतोषजनक है और किसानों को समय पर इनकी आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका होगी महत्वपूर्ण
देशभर में संचालित कृषि विज्ञान केंद्रों को किसानों तक वैज्ञानिक सलाह पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये केंद्र किसानों को मौसम की स्थिति, बुवाई के उपयुक्त समय, फसल चयन, उर्वरक प्रबंधन और रोग नियंत्रण संबंधी जानकारी उपलब्ध कराएंगे।
इसके अलावा मोबाइल संदेश, व्हाट्सऐप, रेडियो, टेलीविजन और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों का उपयोग कर किसानों तक समय पर जानकारी पहुंचाने की योजना बनाई गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर प्राप्त वैज्ञानिक सलाह किसानों को नुकसान कम करने और बेहतर निर्णय लेने में सहायता कर सकती है।
पशुपालन क्षेत्र के लिए भी तैयारी
कमजोर मानसून का प्रभाव केवल फसलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पशुधन पर भी पड़ सकता है। वर्षा की कमी से चारे का संकट उत्पन्न होने की आशंका रहती है।
इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने चारा उपलब्धता की निगरानी शुरू कर दी है। जिन क्षेत्रों में चारे की पर्याप्त उपलब्धता है, वहां से कमी वाले क्षेत्रों तक आपूर्ति की व्यवस्था करने की योजना बनाई जा रही है।
साथ ही चारा भंडारण और वैकल्पिक चारा उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जाएगा ताकि पशुपालकों को कठिन परिस्थितियों में सहायता मिल सके।
किसानों की वित्तीय सुरक्षा पर विशेष ध्यान
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि कृषि संकट के दौरान किसानों की आर्थिक सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, किसान क्रेडिट कार्ड और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं को मजबूत सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।
फसल बीमा योजना के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और मौसम संबंधी जोखिमों से सुरक्षा मिलेगी। वहीं किसान क्रेडिट कार्ड किसानों को जरूरत के समय ऋण उपलब्ध कराने में मदद करेगा।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता भी किसानों को कृषि निवेश के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराएगी।
निगरानी और समन्वय के लिए विशेष व्यवस्था
स्थिति की लगातार निगरानी के लिए केंद्र सरकार ने बहु-स्तरीय समन्वय प्रणाली तैयार की है। केंद्र, राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित किया जा रहा है।
इसके साथ ही विशेष मॉनिटरिंग सेल का गठन किया गया है जो मानसून की प्रगति, फसलों की स्थिति, जल उपलब्धता और कृषि इनपुट की आपूर्ति पर नजर रखेगा।
सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी संभावित समस्या की पहचान समय रहते हो सके और उसका समाधान तुरंत किया जा सके।
चुनौतियों को अवसर में बदलने की तैयारी
केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो जैसी चुनौतियां कृषि क्षेत्र के लिए गंभीर हैं, लेकिन सही योजना और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से इन्हें अवसर में बदला जा सकता है।
उन्होंने किसानों से घबराने के बजाय वैज्ञानिक सलाह अपनाने, जल संरक्षण को बढ़ावा देने और उपलब्ध सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने की अपील की। उनका कहना था कि केंद्र और राज्य सरकारें पूरी तैयारी के साथ किसानों के साथ खड़ी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन और वित्तीय सुरक्षा उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो कमजोर मानसून की स्थिति में भी कृषि क्षेत्र को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।
देश की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा तैयार की गई यह रणनीति आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अब सभी की नजर मानसून की आगामी स्थिति और इन तैयारियों के प्रभावी क्रियान्वयन पर रहेगी।
