भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर समय-समय पर कई तरह की चर्चाएं होती रहती हैं। अक्सर जब फलों, सब्जियों और अनाजों में रासायनिक अवशेषों या मिलावट की बात सामने आती है, तो सबसे पहले पेस्टीसाइड और एग्रोकेमिकल्स को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय को केवल भावनात्मक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर समझने की आवश्यकता है।
क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया (CCFI) के सीनियर एडवाइजर हरीश मेहता का कहना है कि खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर सही जानकारी लोगों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, CCFI लगातार विभिन्न अध्ययनों और उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करता है ताकि वैज्ञानिक समुदाय, नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, गृहिणियों और आम उपभोक्ताओं को वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जा सके।
उनका मानना है कि तथ्यों पर आधारित संवाद ही यह स्पष्ट कर सकता है कि भारतीय खाद्य उत्पाद कितने सुरक्षित, पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक हैं।
MRL क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
मैक्सिमम रेसिड्यू लिमिट (MRL) वह अधिकतम सीमा है, जिसके भीतर किसी खाद्य पदार्थ या पशु चारे में पेस्टीसाइड या अन्य कृषि रसायनों के अवशेष कानूनी रूप से स्वीकार्य माने जाते हैं। यह सीमा वैज्ञानिक परीक्षणों और विषाक्तता संबंधी विस्तृत अध्ययनों के आधार पर तय की जाती है।
MRL का उद्देश्य केवल खाद्य पदार्थों में रसायनों की मात्रा निर्धारित करना नहीं है, बल्कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। विशेषज्ञों के अनुसार, MRL तय करते समय सुरक्षा का पर्याप्त मार्जिन रखा जाता है ताकि बच्चों, गर्भवती महिलाओं और अन्य संवेदनशील वर्गों पर किसी प्रकार का नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
इसके अलावा MRL किसानों के लिए एक मार्गदर्शक मानक भी है। यदि किसी उत्पाद में अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक पाए जाते हैं, तो यह संकेत देता है कि पेस्टीसाइड का उपयोग अनुशंसित मात्रा से अधिक किया गया है या कटाई से ठीक पहले उसका प्रयोग हुआ है। इस प्रकार MRL कृषि में बेहतर और जिम्मेदार प्रथाओं को बढ़ावा देता है।
वैश्विक व्यापार में MRL की भूमिका
आज कृषि उत्पादों का व्यापार केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। भारतीय फल, सब्जियां, मसाले, चाय और चावल दुनिया के अनेक देशों में निर्यात किए जाते हैं। ऐसे में विभिन्न देशों के MRL मानकों का पालन करना निर्यातकों के लिए अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
यदि किसी देश के निर्धारित मानकों से अधिक अवशेष किसी खेप में पाए जाते हैं, तो उस उत्पाद को सीमा पर ही अस्वीकार किया जा सकता है। इससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि खाद्य पदार्थों की बर्बादी भी बढ़ती है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए कोडेक्स एलिमेंटेरियस कमीशन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं वैश्विक स्तर पर मानकीकृत दिशानिर्देश तैयार करती हैं। इनका उद्देश्य विभिन्न देशों के नियमों में सामंजस्य स्थापित करना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुगम बनाना है।
पेस्टीसाइड रेसिड्यू की निगरानी में AINP की भूमिका
भारत में पेस्टीसाइड अवशेषों की निगरानी का महत्वपूर्ण कार्य ऑल इंडिया नेटवर्क प्रोजेक्ट ऑन पेस्टीसाइड रेसिड्यू (AINP) द्वारा किया जाता है। यह परियोजना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत संचालित होती है और इसका मुख्यालय भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा, नई दिल्ली में स्थित है।
यह परियोजना देशभर से कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, मिट्टी और पानी के नमूने एकत्र कर उनकी नियमित जांच करती है। प्राप्त परिणामों के आधार पर खाद्य सुरक्षा की स्थिति का आकलन किया जाता है और आवश्यक सुझाव दिए जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी निगरानी व्यवस्था ने भारतीय कृषि निर्यात को मजबूती प्रदान की है। वर्तमान में भारत का कृषि निर्यात लगभग 51 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है और आने वाले वर्षों में इसे 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
नौ वर्षों के आंकड़े क्या कहते हैं?
वर्ष 2015 से 2024 के बीच AINP द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार कुल 2,09,899 नमूनों की जांच की गई। इनमें से केवल 5,939 नमूने ऐसे पाए गए जिनमें पेस्टीसाइड अवशेष निर्धारित MRL सीमा से अधिक थे।
प्रतिशत के रूप में देखें तो केवल 2.82 प्रतिशत नमूनों में ही निर्धारित सीमा से अधिक अवशेष मिले, जबकि 97.18 प्रतिशत नमूने पूरी तरह से निर्धारित मानकों के अनुरूप पाए गए।
यह आंकड़ा भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार यह प्रदर्शन कई विकसित देशों के बराबर या कुछ मामलों में उनसे बेहतर है, जहां MRL उल्लंघन का प्रतिशत 3 से 6 प्रतिशत के बीच दर्ज किया जाता है।
किन उत्पादों की हुई जांच?
इस अध्ययन में देशभर से विभिन्न प्रकार के कृषि और खाद्य उत्पादों के नमूने लिए गए। इनमें गेहूं, चावल, दालें और अन्य अनाज शामिल थे। सब्जियों में पत्तागोभी, भिंडी, मिर्च तथा अन्य प्रमुख फसलों का परीक्षण किया गया।
फलों की श्रेणी में आम, सेब, अंगूर और अनार जैसे उत्पाद शामिल रहे। इसके अलावा मसाले, चाय, तेलहन, लाल मिर्च पाउडर, करी पत्ता, मांस, मछली, समुद्री उत्पाद, पानी और अंडों की भी जांच की गई।
विशेष रूप से दूध के नमूनों में पेस्टीसाइड अवशेषों की अनुपस्थिति दर्ज की गई, जो उपभोक्ताओं के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।
WTO और निर्यातकों की चुनौती
हालांकि भारत में उत्पाद राष्ट्रीय MRL मानकों के अनुरूप पाए जाते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अलग-अलग देशों के नियम कई बार नई चुनौतियां पैदा करते हैं।
विशेष रूप से यूरोपीय संघ द्वारा कुछ उत्पादों पर 0.01 ppm की अत्यंत सख्त सीमा लागू किए जाने को भारतीय निर्यातक बड़ी चुनौती मानते हैं। मसाले, अंगूर, बासमती चावल, मिर्च और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यातकों का कहना है कि इन मानकों का पालन करना कई बार व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है।
यदि किसी खेप को विदेशी बाजार में अस्वीकार कर दिया जाता है, तो इसका सीधा प्रभाव किसानों, व्यापारियों और निर्यातकों की आय पर पड़ता है। इसलिए उद्योग जगत का मानना है कि इस विषय पर द्विपक्षीय स्तर पर संवाद और समाधान आवश्यक है।
खाद्य सुरक्षा क्यों है जरूरी?
हरीश मेहता के अनुसार खाद्य सुरक्षा केवल पेस्टीसाइड अवशेषों तक सीमित नहीं है। यह खाद्य जनित बीमारियों, बैक्टीरिया, परजीवियों और अन्य रासायनिक संदूषकों से लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ विषय है।
सुरक्षित खाद्य प्रणाली कमजोर वर्गों की रक्षा करती है, स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को कम करती है और उपभोक्ताओं का विश्वास बनाए रखती है। सही भंडारण, स्वच्छ प्रसंस्करण और सुरक्षित पकाने की प्रक्रियाएं साल्मोनेला जैसे रोगजनकों से होने वाली फूड पॉइजनिंग को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसके साथ ही खाद्य गुणवत्ता बनाए रखने से उत्पादों की पोषण क्षमता सुरक्षित रहती है और बाजार में उनकी विश्वसनीयता भी बढ़ती है। किसी भी व्यवसाय के लिए अच्छी गुणवत्ता उसकी ब्रांड छवि और दीर्घकालिक प्रतिष्ठा का आधार होती है।
निष्कर्ष
उपलब्ध आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत में अधिकांश कृषि और खाद्य उत्पाद निर्धारित सुरक्षा मानकों के भीतर हैं। हालांकि निगरानी और सुधार की प्रक्रिया लगातार जारी रहनी चाहिए, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो रही है। भविष्य में किसानों, वैज्ञानिकों, उद्योग जगत और सरकार के संयुक्त प्रयास ही यह सुनिश्चित करेंगे कि भारतीय उपभोक्ताओं तक सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और पौष्टिक भोजन पहुंचता रहे।

