केंद्र सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को आर्थिक सहायता उपलब्ध करा रही है। प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को दो वर्षों तक प्रति एकड़ प्रति वर्ष ₹4,000 की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। यह सहायता अधिकतम एक एकड़ भूमि के लिए उपलब्ध होगी। इस राशि का उपयोग किसान प्राकृतिक खेती अपनाने, अन्य किसानों को प्रशिक्षण देने, पशुधन के रखरखाव, प्राकृतिक कृषि आदानों की तैयारी तथा जैव-आदान संसाधन केंद्रों (Bio-input Resource Centres) से आवश्यक सामग्री खरीदने में कर सकेंगे।
यह जानकारी केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से दी।
2020-21 से चल रहा है प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय अध्ययन
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने वर्ष 2020-21 से अखिल भारतीय प्राकृतिक खेती नेटवर्क कार्यक्रम (All India Network Programme on Natural Farming) के तहत देश के 16 राज्यों में 20 सहयोगी केंद्रों पर व्यापक अध्ययन शुरू किया है। पहले यह कार्यक्रम ऑर्गेनिक फार्मिंग पर केंद्रित था, जिसे बाद में प्राकृतिक खेती पर विस्तारित किया गया।
इस शोध कार्यक्रम में 11 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, 8 आईसीएआर संस्थान/केंद्र तथा एक डीम्ड विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसके तहत आठ प्रमुख फसल प्रणालियों का अध्ययन कर विभिन्न राज्यों के लिए प्राकृतिक खेती के वैज्ञानिक पैकेज विकसित किए जा रहे हैं।
सही तकनीक अपनाने पर बढ़ी पैदावार
आईसीएआर के अध्ययन में पाया गया कि यदि प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक तरीके और संतुलित प्रबंधन के साथ अपनाया जाए तो फसलों की उत्पादकता में सुधार संभव है। शुरुआती वर्षों में मिट्टी की सेहत बेहतर होने से फसलों की गुणवत्ता, स्वाद और दीर्घकालिक उत्पादन क्षमता बढ़ती है। साथ ही रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम होने से किसानों का शुद्ध लाभ भी बढ़ता है।
मल्चिंग और बहुफसली खेती से मिट्टी हुई अधिक उपजाऊ
शोध में यह भी सामने आया कि प्राकृतिक खेती में मल्चिंग (Mulching) का उपयोग मिट्टी में नमी बनाए रखने, खरपतवार नियंत्रण और जैविक पदार्थ बढ़ाने में प्रभावी साबित हुआ है। इससे मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है और मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है।
वहीं बहुफसली खेती (Multi-cropping) अपनाने से खेतों में जैव विविधता बढ़ी, कीट एवं रोगों का प्रकोप कम हुआ तथा पौधों द्वारा पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग संभव हुआ।
विभिन्न राज्यों के लिए विकसित हुए प्राकृतिक खेती मॉडल
आईसीएआर ने अलग-अलग राज्यों की जलवायु और कृषि परिस्थितियों के अनुसार कई प्राकृतिक खेती आधारित फसल प्रणालियां विकसित की हैं।
राजस्थान और गुजरात के लिए मूंगफली + तिल – सौंफ + पत्तागोभी मॉडल विकसित किया गया है, जबकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के लिए सोयाबीन + मक्का – गेहूं + सरसों आधारित प्रणाली तैयार की गई है। केरल के लिए कसावा आधारित प्राकृतिक खेती मॉडल विकसित किया गया है।
हिमालयी राज्यों में जैविक खेती से भी बेहतर परिणाम
हिमाचल प्रदेश के बजौरा, उत्तराखंड के अल्मोड़ा तथा सिक्किम के गंगटोक में किए गए पांच वर्षीय परीक्षणों में सोयाबीन + मक्का – मटर + धनिया फसल प्रणाली के अंतर्गत प्राकृतिक खेती से औसतन 6,475 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष (सोयाबीन समतुल्य) उत्पादकता प्राप्त हुई। यह जैविक खेती और एकीकृत फसल प्रबंधन की तुलना में लगभग 5 प्रतिशत अधिक रही।
इसी प्रकार भोपाल, जबलपुर और रायपुर में सोयाबीन + मक्का – गेहूं + सरसों प्रणाली के तहत प्राकृतिक खेती की औसत उत्पादकता 3,346 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष दर्ज की गई, जो एकीकृत फसल प्रबंधन और जैविक खेती के बराबर रही।
वहीं गुजरात, अजमेर और उदयपुर में लोबिया + मक्का/मूंगफली + तिल – सौंफ + फूलगोभी/पत्तागोभी प्रणाली में प्राकृतिक खेती से 9,209 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष (लोबिया समतुल्य) औसत उत्पादकता दर्ज की गई, जो एकीकृत फसल प्रबंधन के समान पाई गई।
मिट्टी की सेहत में हुआ उल्लेखनीय सुधार
शोध के दौरान प्राकृतिक खेती वाले खेतों में मिट्टी की गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार देखा गया। दो से तीन वर्षों में मिट्टी में जैविक कार्बन (SOC) का स्तर लगभग 0.90 प्रतिशत से बढ़कर 1.15 प्रतिशत तक पहुंच गया।
इसके अलावा प्राकृतिक खेती वाले खेतों में लाभकारी बैक्टीरिया, फफूंद और एक्टिनोमाइसीट्स जैसे सूक्ष्मजीवों की संख्या और विविधता भी रासायनिक खेती की तुलना में अधिक पाई गई। इससे पोषक तत्वों का चक्र बेहतर हुआ, मिट्टी की संरचना मजबूत बनी और दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता को आधार मिला।
नीति आयोग की रिपोर्ट ने भी किए दावे मजबूत
नीति आयोग की मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक खेती अपनाने वाले लगभग 91.2 प्रतिशत किसानों ने फसल उत्पादन और मिट्टी की सेहत में सुधार का अनुभव किया। वहीं 90.1 प्रतिशत किसानों ने बताया कि प्राकृतिक खेती अपनाने से खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे उनकी आय और लाभप्रदता बढ़ी है।
किसानों को मिलेगा प्रत्यक्ष आर्थिक प्रोत्साहन
सरकार के मिशन के तहत किसानों को आउटपुट आधारित प्रोत्साहन (Output Based Incentive) के रूप में प्रति एकड़ प्रति वर्ष ₹4,000 की सहायता दो वर्षों तक दी जाएगी। यह सहायता अधिकतम एक एकड़ भूमि के लिए उपलब्ध होगी।
इस राशि का उपयोग किसान प्राकृतिक खेती के अभ्यास, अन्य किसानों को प्रशिक्षण देने, पशुधन के रखरखाव, जीवामृत एवं अन्य प्राकृतिक कृषि आदानों की तैयारी, मिश्रण एवं भंडारण के लिए आवश्यक पात्र खरीदने तथा बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRC) से जैविक आदान खरीदने में कर सकेंगे।
प्राकृतिक खेती को नई दिशा देने की तैयारी
केंद्र सरकार का मानना है कि प्राकृतिक खेती न केवल किसानों की लागत कम करने में सहायक होगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आईसीएआर के वैज्ञानिक अध्ययन और नीति आयोग की रिपोर्ट से मिले सकारात्मक परिणामों के आधार पर सरकार आने वाले वर्षों में प्राकृतिक खेती के विस्तार और अधिक किसानों को इससे जोड़ने की दिशा में तेजी से कार्य कर रही है।

