भारत में धान की खेती किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन धान उत्पादन के साथ पानी की अधिक खपत, मीथेन उत्सर्जन और मिट्टी की गुणवत्ता जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। ऐसे समय में तकनीक आधारित जल प्रबंधन और क्लाइमेट-स्मार्ट खेती को बढ़ावा देने की कोशिश तेज हो रही है। इसी दिशा में डीप-टेक कंपनी मिट्टी लैब्स ने भारत में 1 लाख हेक्टेयर छोटे धान किसानों के खेतों में क्लाइमेट-स्मार्ट खेती को बढ़ाने के लिए Google के साथ पांच साल के बड़े कार्बन क्रेडिट समझौते की घोषणा की है।
इस साझेदारी का उद्देश्य 70 हजार से अधिक किसानों को ऐसी सिंचाई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिनसे पानी की खपत और धान के खेतों से निकलने वाली मीथेन दोनों को कम किया जा सके। कंपनी का अनुमान है कि इस पहल से करीब 3 मिलियन टन GWP20 के बराबर जलवायु प्रभाव को कम किया जा सकता है। साथ ही अरबों लीटर पानी की बचत होने की उम्मीद है।
धान की खेती में मीथेन क्यों बड़ी चुनौती है
धान के खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहने के कारण मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में मीथेन पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं और वातावरण में मीथेन का उत्सर्जन बढ़ता है। मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कम समय तक वातावरण में रहती है, लेकिन कम अवधि में गर्मी बढ़ाने की इसकी क्षमता काफी अधिक होती है।
इसी कारण धान की खेती में पानी के प्रबंधन को बदलना जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक महत्वपूर्ण तरीका माना जा रहा है। मिट्टी लैब्स का मॉडल खेत में लगातार पानी भरे रखने के बजाय ऐसी सिंचाई व्यवस्था को बढ़ावा देता है जिसमें खेत को जरूरत के अनुसार पानी दिया जाता है।
कंपनी के अनुसार इससे धान के खेतों से मीथेन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत तक कमी और सिंचाई के लिए पानी की मात्रा में करीब 40 प्रतिशत तक कमी संभव है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका लक्ष्य धान की पैदावार को बनाए रखना है।
1 लाख हेक्टेयर में क्लाइमेट-स्मार्ट खेती
Google के साथ समझौते के तहत मिट्टी लैब्स भारत में करीब 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इस मॉडल को बढ़ाने की दिशा में काम करेगी। इसके तहत छोटे किसानों को पानी बचाने वाली सिंचाई पद्धतियों को अपनाने में मदद दी जाएगी।
मिट्टी लैब्स की तकनीक की खासियत यह है कि इसमें सैटेलाइट रडार डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जमीन से जुटाए गए आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे अलग-अलग खेतों के स्तर पर मिट्टी की नमी, फसल की स्थिति और खेत में पानी की स्थिति को समझने में मदद मिलती है।
कंपनी का GeoAI प्लेटफॉर्म किसानों के खेतों को डिजिटल तरीके से मॉनिटर करने में मदद करता है। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि किस खेत में कितनी नमी है और कहां पानी की जरूरत है। इस तरह सिंचाई को सामान्य अनुमान के बजाय खेत की वास्तविक स्थिति के आधार पर बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।
पानी के साथ उर्वरक प्रबंधन भी जरूरी
धान की खेती में केवल पानी बचाना ही पर्याप्त नहीं है। बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सेहत के लिए उर्वरक प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यूरिया, डीएपी और अन्य पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल किसानों की उत्पादन लागत और मिट्टी की गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है।
क्लाइमेट-स्मार्ट खेती के मॉडल में भविष्य में पानी प्रबंधन के साथ पोषक तत्व प्रबंधन को भी डिजिटल तकनीक से जोड़ने की बड़ी संभावना है। खेत की मिट्टी, फसल की अवस्था और नमी की जानकारी उपलब्ध होने पर किसान यह तय करने में बेहतर स्थिति में हो सकते हैं कि फसल को कब और कितनी मात्रा में पोषक तत्वों की जरूरत है।
इससे बिना जरूरत अधिक यूरिया या दूसरे उर्वरकों के इस्तेमाल को कम किया जा सकता है। संतुलित उर्वरक उपयोग से खेती की लागत घटाने के साथ मिट्टी में पोषक तत्वों के असंतुलन की समस्या को भी नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि किसान उर्वरक का इस्तेमाल बंद कर दें। बल्कि लक्ष्य यह होना चाहिए कि फसल की जरूरत, मिट्टी की स्थिति और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल किया जाए। जल प्रबंधन और उर्वरक प्रबंधन को एक साथ आगे बढ़ाने से धान की खेती को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।
सैटेलाइट तकनीक से खेतों की निगरानी
मिट्टी लैब्स का GeoAI प्लेटफॉर्म हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट रडार डेटा को खेतों से जुटाए गए ग्राउंड ट्रुथ डेटा के साथ जोड़ता है। इससे छोटे-छोटे खेतों के स्तर पर फसल और मिट्टी से संबंधित जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।
यह तकनीक खास तौर पर छोटे किसानों के लिए उपयोगी हो सकती है, क्योंकि भारत में बड़ी संख्या में किसान छोटी जोत पर खेती करते हैं। ऐसे में पूरे क्षेत्र के औसत आंकड़ों के बजाय खेत-विशेष जानकारी उपलब्ध होना कृषि सलाह को अधिक सटीक बनाने में मदद कर सकता है।
भविष्य में इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल सिंचाई, उर्वरक, कीट प्रबंधन और फसल स्वास्थ्य की निगरानी में भी बढ़ाया जा सकता है।
किसानों के लिए दोहरा फायदा
इस पहल से किसानों को सीधे तौर पर पानी की बचत और खेती की लागत में कमी का फायदा मिल सकता है। यदि सिंचाई के लिए कम पानी की जरूरत पड़े तो बिजली या डीजल से चलने वाले पंपों पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है।
इसके अलावा, यदि मिट्टी की स्थिति और फसल की जरूरत के अनुसार उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाए तो अनावश्यक उर्वरक खर्च को नियंत्रित किया जा सकता है। इससे उत्पादन लागत कम करने और खेती को अधिक लाभकारी बनाने में मदद मिल सकती है।
कार्बन क्रेडिट मॉडल के जरिए किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन मिलने की भी संभावना है। हालांकि कार्बन क्रेडिट से मिलने वाले लाभ का वास्तविक हिस्सा, भुगतान व्यवस्था और किसानों तक उसका पहुंचना इस मॉडल की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
भारत में टिकाऊ धान उत्पादन की दिशा
भारत में धान की खेती खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन पानी की उपलब्धता और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में ऐसी तकनीकों की जरूरत है जो किसान की पैदावार को नुकसान पहुंचाए बिना पानी और प्राकृतिक संसाधनों की बचत कर सकें।
मिट्टी लैब्स और Google की साझेदारी इसी दिशा में एक बड़ा प्रयोग है। कंपनी का लक्ष्य आने वाले समय में लाखों धान के खेतों को डिजिटल डेटासेट और ‘डिजिटल ट्विन्स’ के रूप में मैप करना है। इससे अलग-अलग खेतों की परिस्थितियों को समझकर कम पानी में बेहतर उत्पादन के मॉडल तैयार करने में मदद मिल सकती है।
उर्वरक क्षेत्र के लिए भी इस बदलाव का महत्व कम नहीं है। भारत में यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों की मांग लगातार बनी रहती है। यदि भविष्य में सैटेलाइट, AI और मिट्टी की जानकारी के आधार पर किसान पोषक तत्वों का अधिक संतुलित इस्तेमाल कर सकें तो उर्वरक की दक्षता बढ़ाई जा सकती है। इससे सरकार पर सब्सिडी का दबाव कम करने और किसानों की लागत को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, धान की खेती का भविष्य केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में पानी की बचत, मीथेन उत्सर्जन में कमी, मिट्टी की सेहत, संतुलित उर्वरक उपयोग और डिजिटल तकनीक एक साथ कृषि व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। मिट्टी लैब्स और Google की यह पहल इसी बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है।

