भारत की कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ, उत्पादक और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से “भारत मृदा स्वास्थ्य नीति (Bharat Soil Health Policy-BSHP)” पर एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय परामर्श कार्यशाला का आयोजन पंजाब के लुधियाना स्थित आईसीएआर–भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIMR) में किया गया। यह कार्यशाला ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS), इंटरनेशनल फर्टिलाइजर डेवलपमेंट सेंटर (IFDC) तथा सेव सॉइल (Save Soil) आंदोलन के सहयोग से आयोजित की गई।
यह परामर्श कार्यक्रम उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के लिए आयोजित राष्ट्रीय स्तर की चर्चाओं की श्रृंखला का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य देश की मिट्टी को एक रणनीतिक राष्ट्रीय संसाधन के रूप में संरक्षित, पुनर्जीवित और सतत रूप से प्रबंधित करने के लिए व्यापक नीति ढांचा तैयार करना है।
मिट्टी की सेहत से जुड़ा है देश का भविष्य
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के उप महानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन) डॉ. ए.के. नायक ने कहा कि मिट्टी की गुणवत्ता केवल कृषि उत्पादन को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन, जल संरक्षण, जलवायु अनुकूलन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से भी सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग, जैविक कार्बन में कमी, भूमि क्षरण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के कारण मृदा स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, पुनर्योजी कृषि और विभिन्न हितधारकों की साझेदारी के माध्यम से दीर्घकालिक समाधान विकसित करने की आवश्यकता है।
डॉ. नायक ने यह भी कहा कि यदि समय रहते मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में कृषि उत्पादन और किसानों की आय दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
विज्ञान आधारित हस्तक्षेपों पर जोर
आईसीएआर–भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान, लुधियाना के निदेशक डॉ. नचिकेत कोटवालीवाले ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचारों के माध्यम से मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए संस्थान लगातार कार्य कर रहा है।
उन्होंने कहा कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए केवल उर्वरकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए फसल चक्र, जैविक पदार्थों का उपयोग, सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंधन तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि तकनीकों को अपनाना भी आवश्यक है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत मृदा स्वास्थ्य नीति देश के कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
किसान-केंद्रित नीति की आवश्यकता
कार्यक्रम में भारत मृदा स्वास्थ्य नीति के कोर ग्रुप सदस्य और राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. ए.के. सिंह ने कहा कि किसी भी कृषि नीति की सफलता उसके जमीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। इसलिए नीति निर्माण में वैज्ञानिक ज्ञान के साथ-साथ किसानों के अनुभवों और आवश्यकताओं को भी शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों की मिट्टी, जलवायु और खेती की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए एक ऐसी नीति विकसित की जानी चाहिए जो स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किसानों को व्यावहारिक समाधान उपलब्ध करा सके।
कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल (ASRB) के पूर्व सदस्य डॉ. बी.एस. द्विवेदी ने भी वैज्ञानिक शोध और नीति निर्माण के बीच मजबूत समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य सुधार के लिए दीर्घकालिक रणनीतियों और स्पष्ट कार्ययोजनाओं की जरूरत है।
मिट्टी की वैज्ञानिक जांच और डेटा आधारित निर्णयों पर बल
आईसीएआर–भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान (IISS), भोपाल के निदेशक डॉ. एम. मोहंती ने कहा कि मिट्टी की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए नियमित वैज्ञानिक परीक्षण और डेटा आधारित मूल्यांकन आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि मिट्टी की गुणवत्ता से संबंधित सटीक आंकड़े नीति निर्माताओं को बेहतर निर्णय लेने में मदद करेंगे। साथ ही इससे किसानों को भी यह जानकारी मिलेगी कि उनकी भूमि में कौन से पोषक तत्वों की कमी है और किस प्रकार के सुधारात्मक उपाय अपनाने चाहिए।
उन्होंने वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित हस्तक्षेपों को भविष्य की कृषि नीति का आधार बनाने की वकालत की।
अनुसंधान और किसानों के बीच मजबूत कड़ी बनाने की जरूरत
गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (GADVASU) के विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. आर.एस. ग्रेवाल तथा आईसीएआर-अटारी के निदेशक डॉ. परविंदर श्योराण ने कृषि अनुसंधान और किसानों के बीच मजबूत संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि देश में कई महत्वपूर्ण कृषि तकनीकें विकसित की जाती हैं, लेकिन अक्सर वे किसानों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पातीं। इसलिए विस्तार सेवाओं को मजबूत बनाकर शोध संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और किसानों के बीच बेहतर संवाद स्थापित करना जरूरी है।
भारत मृदा स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य
भारत मृदा स्वास्थ्य नीति को आईसीएआर, TAAS, IFDC और Save Soil आंदोलन द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया जा रहा है। इस नीति का उद्देश्य देश में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को मजबूत बनाना, पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना और टिकाऊ भूमि प्रबंधन प्रणालियों को विकसित करना है।
कार्यक्रम के दौरान IFDC के डॉ. यश सहारावत ने नीति की रूपरेखा, उद्देश्यों और दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह नीति केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक होगी।
वहीं Save Soil आंदोलन की डॉ. प्रवीणा श्रीधर ने कहा कि मिट्टी संरक्षण को जन आंदोलन का रूप देना आवश्यक है। उन्होंने लोगों में जागरूकता बढ़ाने और सामूहिक प्रयासों के महत्व पर जोर दिया।
कार्यशाला में उठे कई महत्वपूर्ण मुद्दे
कार्यशाला के विभिन्न तकनीकी सत्रों में मृदा स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों, वैज्ञानिक प्राथमिकताओं, नीति समन्वय, मृदा डेटा प्रणाली, नवाचारों और प्रोत्साहन तंत्र जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई।
इसके अलावा समूह चर्चाओं में नीति क्रियान्वयन, किसानों को प्रोत्साहन, कार्बन बाजारों की संभावनाएं, संस्थागत सहयोग और निवेश के अवसरों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।
विशेषज्ञों ने माना कि यदि किसानों को उचित प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता प्रदान की जाए तो बड़े पैमाने पर टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाया जा सकता है।
टिकाऊ कृषि और खाद्य सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
कार्यशाला के समापन पर विशेषज्ञों ने उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण सुझाव और कार्यनीतियां प्रस्तुत कीं। इन सिफारिशों का उद्देश्य देश में मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना और कृषि क्षेत्र को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना है।
इस परामर्श कार्यक्रम में आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों, किसान संगठनों, कृषि उद्योगों तथा शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि स्वस्थ मिट्टी के बिना टिकाऊ कृषि, खाद्य सुरक्षा और किसानों की समृद्धि की कल्पना संभव नहीं है।
भारत मृदा स्वास्थ्य नीति इसी दिशा में एक दूरदर्शी पहल है, जो आने वाले वर्षों में देश की कृषि व्यवस्था को अधिक मजबूत, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।


