पिछले एक दशक में भारत के कृषि क्षेत्र ने तेज प्रगति की है। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र की औसत विकास दर 4 फीसदी से अधिक रही है। अनाज, बागवानी और तिलहन के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। किसानों द्वारा आधुनिक तकनीक अपनाने, सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, पानी के बेहतर इस्तेमाल और समय पर उर्वरकों की उपलब्धता ने कृषि उत्पादन को मजबूत किया है। खास तौर पर बागवानी फसलों का महत्व लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में इस क्षेत्र में और तेजी की संभावना है।
लेकिन कृषि क्षेत्र की इस उपलब्धि के साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है। केमिकल फर्टिलाइज़र के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत पर दबाव बढ़ रहा है। कई क्षेत्रों में मुख्य फसलों की उत्पादकता एक स्तर पर स्थिर होती दिखाई दे रही है, जबकि किसान उत्पादन बनाए रखने के लिए उर्वरकों की मात्रा बढ़ा रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, नाइट्रोजन यूज एफिशिएंसी यानी NUE में गिरावट इस समस्या को और गंभीर बना रही है।
केमिकल फर्टिलाइज़र के बढ़ते इस्तेमाल से मिट्टी की सेहत पर असर
कृषि उत्पादन बढ़ाने में केमिकल फर्टिलाइज़र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों ने किसानों को फसलों के लिए आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराए हैं। लेकिन किसी भी पोषक तत्व का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल लंबे समय में मिट्टी के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
कई कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि एक समय के बाद केमिकल फर्टिलाइज़र की अतिरिक्त मात्रा फसल की उत्पादकता में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं करती। इसके पीछे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता, पोषक तत्वों का असंतुलन, माइक्रो-न्यूट्रिएंट की कमी और ऑर्गेनिक कार्बन का कम स्तर जैसे कारण हो सकते हैं।
इस स्थिति में किसान अधिक उर्वरक डालकर उत्पादन बनाए रखने की कोशिश करता है। इससे उर्वरक इस्तेमाल की दक्षता और कम हो सकती है। इस तरह एक ऐसा चक्र बन जाता है जिसमें कम दक्षता की भरपाई के लिए अधिक केमिकल फर्टिलाइज़र इस्तेमाल किया जाता है।
सॉइल हेल्थ कार्ड से सामने आई मिट्टी की चुनौती
सरकार की सॉइल हेल्थ और फर्टिलिटी से जुड़ी पहल के तहत देश में लगभग 26 करोड़ सॉइल हेल्थ कार्ड वितरित किए जा चुके हैं। इन कार्डों के जरिए मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों और उसकी उर्वरता की स्थिति का आकलन करने में मदद मिली है।
देशभर के मिट्टी परीक्षण से सामने आए आंकड़ों में ऑर्गेनिक कार्बन यानी SOC का कम स्तर एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आया है। स्वस्थ मिट्टी में SOC का स्तर सामान्य तौर पर 1 फीसदी से अधिक होना बेहतर माना जाता है, जबकि कई क्षेत्रों में इसका औसत स्तर लगभग 0.5 फीसदी के आसपास बताया गया है। कुछ क्षेत्रों में यह स्तर 0.3 फीसदी तक कम पाया गया है।
ऑर्गेनिक कार्बन मिट्टी की संरचना, पानी रोकने की क्षमता और पौधों के लिए पोषक तत्वों की उपलब्धता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए SOC में कमी सीधे तौर पर मिट्टी की उत्पादक क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
कम ऑर्गेनिक कार्बन से पानी की समस्या
मिट्टी में SOC की कमी होने से उसकी संरचना और पोरोसिटी प्रभावित होती है। इसका असर मिट्टी की पानी सोखने और पानी रोककर रखने की क्षमता पर पड़ता है।
जब मिट्टी की संरचना खराब होती है तो बारिश या सिंचाई का पानी खेत में पर्याप्त समय तक नहीं टिक पाता। पानी तेजी से बह सकता है या मिट्टी की ऊपरी सतह से बाहर निकल सकता है। इससे पौधों को उपलब्ध पानी कम मिलता है और भूजल रिचार्ज की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में किसान को सिंचाई पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन और अनियमित बारिश के दौर में मिट्टी की पानी रोकने की क्षमता बढ़ाना कृषि की स्थिरता के लिए बेहद जरूरी हो जाता है।
कम SOC से पोषक तत्वों का अवशोषण भी प्रभावित
कम ऑर्गेनिक कार्बन का दूसरा महत्वपूर्ण प्रभाव पौधों की पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता पर पड़ सकता है। जब मिट्टी में जैविक गतिविधि और संरचना कमजोर होती है तो पौधों तक पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में किसान समान उत्पादकता हासिल करने के लिए अधिक केमिकल फर्टिलाइज़र का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन अतिरिक्त उर्वरक हमेशा अतिरिक्त उत्पादन में परिवर्तित नहीं होता। इससे उर्वरक की उपयोग दक्षता घट सकती है और किसानों की लागत बढ़ सकती है।
भारत को यूरिया, फॉस्फेट और पोटाश से जुड़े कई कच्चे माल और तैयार उत्पादों के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए यदि उर्वरक का इस्तेमाल अधिक हो और उसकी दक्षता कम हो, तो इसका असर किसानों की लागत के साथ-साथ देश के विदेशी मुद्रा खर्च पर भी पड़ता है।
मिट्टी के मित्र माइक्रोब्स और कीड़ों का महत्व
मिट्टी केवल खनिजों का मिश्रण नहीं है। इसमें करोड़ों सूक्ष्मजीव, बैक्टीरिया, फंगस और दूसरे जीव मौजूद होते हैं, जो मिट्टी की सेहत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कुछ माइक्रोब्स जैविक पदार्थों को तोड़कर पौधों के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। वहीं मिट्टी में मौजूद कई जीव इसकी संरचना और पोरोसिटी को बेहतर बनाने में योगदान करते हैं।
केमिकल फर्टिलाइज़र और पेस्टिसाइड का असंतुलित या गलत इस्तेमाल इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर असर डाल सकता है। इससे मिट्टी की जैविक गतिविधि कमजोर हो सकती है और लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा बढ़ सकता है।
खाद्य सुरक्षा और एक्सपोर्ट पर भी असर
अत्यधिक या गलत तरीके से इस्तेमाल किए गए केमिकल फर्टिलाइज़र और पेस्टिसाइड की चिंता सिर्फ मिट्टी तक सीमित नहीं है। इसका संबंध खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ता है।
फलों, सब्जियों, अनाज और दूसरी व्यावसायिक फसलों में यदि पेस्टिसाइड अवशेष निर्धारित सीमा से अधिक पाए जाते हैं, तो घरेलू बाजार में खाद्य सुरक्षा की चिंता बढ़ सकती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऐसे उत्पादों की खेप रिजेक्ट होने का जोखिम भी रहता है।
भारत कृषि उत्पादों का एक बड़ा निर्यातक देश है। इसलिए उत्पाद की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा का सीधा संबंध ब्रांड इंडिया से है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सुरक्षित और टिकाऊ कृषि उत्पादन महत्वपूर्ण है।
नेशनल मिशन फॉर नेचुरल फार्मिंग की शुरुआत
इन चुनौतियों के बीच सरकार ने वर्ष 2024 में नेशनल मिशन फॉर नेचुरल फार्मिंग शुरू किया। इसका उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक और कम बाहरी इनपुट वाली खेती की ओर प्रोत्साहित करना है।
प्राकृतिक खेती में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है। इसमें स्थानीय नस्ल के पशुओं से प्राप्त गोबर और गोमूत्र सहित दूसरे जैविक संसाधनों से विभिन्न इनपुट तैयार करने की अवधारणा है।
इस मॉडल का उद्देश्य केवल केमिकल फर्टिलाइज़र को हटाना नहीं, बल्कि मिट्टी की जैविक गतिविधि, ऑर्गेनिक कार्बन, पोषक तत्वों की उपलब्धता और पानी की उपयोग दक्षता में सुधार करना भी है।
बीजामृत और जीवामृत का इस्तेमाल
प्राकृतिक खेती में बीज उपचार के लिए बीजामृत का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य बीजों के बेहतर अंकुरण और शुरुआती पौधों की मजबूती में सहायता करना है।
इसी तरह जीवामृत, घन-जीवामृत और सप्तयांकुर जैसे जैविक इनपुट को मिट्टी में उपयोगी माइक्रोबियल गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इनका उद्देश्य मिट्टी की जैविक गुणवत्ता और पौधों के पोषण को बेहतर करना है।
फसल सुरक्षा के लिए भी प्राकृतिक खेती में विभिन्न स्थानीय फॉर्मूलेशन इस्तेमाल किए जाते हैं। सौंठास्त्र और खट्टी लस्सी जैसे इनपुट का उपयोग पौधों की सुरक्षा से जुड़े तरीकों में किया जाता है, जबकि नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र और दशपानी अर्क जैसे फॉर्मूलेशन अलग-अलग कीटों और पेस्ट के प्रबंधन में इस्तेमाल किए जाते हैं।
इन सभी इनपुट का सही तरीके से तैयार होना, उचित मात्रा में इस्तेमाल और फसल व क्षेत्र के अनुसार उपयोग महत्वपूर्ण है।
7.5 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र का लक्ष्य
नेशनल मिशन फॉर नेचुरल फार्मिंग को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। मिशन के तहत 7.5 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य रखा गया है।
कम से कम 50 हेक्टेयर के क्लस्टर में बड़ी संख्या में किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने की योजना है। किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देने में कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिक, किसान ट्रेनर और कृषि सखियों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इसका उद्देश्य केवल प्राकृतिक खेती की जानकारी देना नहीं है, बल्कि किसानों को इसे सही तरीके से अपनाने, स्थानीय संसाधनों से इनपुट तैयार करने और फसल उत्पादन में इसके प्रभाव को समझने में सक्षम बनाना है।
बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर से किसानों को मदद
प्राकृतिक खेती में सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण जैविक इनपुट की उपलब्धता हो सकती है। इसे देखते हुए बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर विकसित किए जा रहे हैं।
स्थानीय डेयरी, पशु आश्रय स्थल और अन्य संसाधन केंद्रों पर इनपुट तैयार करने की व्यवस्था किसानों को कम लागत पर प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है।
जिन किसानों के पास स्थानीय नस्ल के पशु हैं, उन्हें खेत पर ही प्राकृतिक खेती के इनपुट तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे बाजार से बाहरी इनपुट खरीदने की जरूरत कम हो सकती है।
ICAR कर रहा वैज्ञानिक मूल्यांकन
प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए वैज्ञानिक प्रमाण और क्षेत्र-विशिष्ट रणनीति जरूरी है। इसी दिशा में इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च यानी ICAR और कृषि विश्वविद्यालयों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
ICAR संस्थानों द्वारा अलग-अलग फसल और कृषि-जलवायु क्षेत्रों के हिसाब से प्राकृतिक खेती की संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि किन क्षेत्रों और फसलों में प्राकृतिक खेती के तरीके अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
विभिन्न संस्थानों में किए जा रहे ट्रायल से प्राप्त आंकड़ों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किसानों का भरोसा बढ़ाने में मदद कर सकता है। किसी भी कृषि तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए उसके उत्पादन, लागत, मिट्टी की सेहत और किसान आय पर लंबे समय के प्रभाव को समझना जरूरी है।
प्राकृतिक उत्पादों की मार्केटिंग भी जरूरी
प्राकृतिक खेती को लंबे समय तक सफल बनाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर बाजार और उचित कीमत मिलना भी जरूरी है।
नेशनल सेंटर फॉर ऑर्गेनिक एंड नेचुरल फार्मिंग यानी NCONF द्वारा प्राकृतिक खेती के उत्पादों के प्रमाणन से जुड़े प्रोटोकॉल विकसित किए गए हैं। पार्टिसिपेटरी गारंटी सिस्टम यानी PGS के माध्यम से भी किसानों को प्रमाणन व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
यदि प्राकृतिक तरीके से उत्पादित फसलों को विश्वसनीय प्रमाणन, बेहतर ब्रांडिंग और बाजार उपलब्ध होता है, तो किसानों को सामान्य उत्पादों की तुलना में प्रीमियम कीमत मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
हाइब्रिड मॉडल भी बन सकता है विकल्प
भारत जैसे बड़े और विविध कृषि देश में हर क्षेत्र में एक ही कृषि मॉडल लागू करना आसान नहीं है। इसलिए प्राकृतिक खेती के साथ एक हाइब्रिड मॉडल भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस मॉडल में प्राकृतिक खेती की तकनीकों के साथ जरूरत के अनुसार सीमित मात्रा में केमिकल फर्टिलाइज़र का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उद्देश्य अचानक पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों को हटाने के बजाय धीरे-धीरे उनकी निर्भरता कम करना है।
यदि मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ता है, माइक्रोबियल गतिविधि बेहतर होती है और पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है, तो भविष्य में किसान कम बाहरी इनपुट के साथ समान या बेहतर उत्पादन हासिल करने की स्थिति में आ सकते हैं।
मिडिल ईस्ट संकट के बीच प्राकृतिक खेती की अहमियत
मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक फर्टिलाइज़र सप्लाई और कीमतों को लेकर जोखिम बढ़ाया है। भारत जैसे बड़े कृषि देश के लिए आयातित कच्चे माल और उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता एक आर्थिक चुनौती बन सकती है।
इसी संदर्भ में किसानों द्वारा केमिकल फर्टिलाइज़र का सही और संतुलित इस्तेमाल और प्राकृतिक खेती को अपनाना महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री की ओर से नागरिकों से की गई अपील में भी उर्वरकों के उचित इस्तेमाल और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
प्राकृतिक खेती का विस्तार केवल पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा नहीं है। इसका संबंध किसान की लागत, मिट्टी की उत्पादकता, जल संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और देश की विदेशी मुद्रा बचत से भी है।
प्राकृतिक खेती से बढ़ सकती है पशुओं की आर्थिक उपयोगिता
प्राकृतिक खेती में स्थानीय पशुओं से प्राप्त गोबर और गोमूत्र जैसे संसाधनों के इस्तेमाल से पशुपालन और खेती के बीच संबंध मजबूत हो सकता है। इससे उन पशुओं की आर्थिक उपयोगिता बढ़ाने का अवसर भी मिलता है जिन्हें दूध देने की उम्र पार करने के बाद अक्सर छोड़ दिया जाता है।
यदि पशु आधारित जैविक संसाधनों का वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो किसानों को खेत के लिए कुछ इनपुट स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो सकते हैं। इससे खेती की बाहरी लागत कम करने में मदद मिल सकती है।
आगे की राह: मिट्टी की सेहत और उत्पादन के बीच संतुलन
भारत के लिए आने वाले वर्षों में कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत को बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होना चाहिए। केवल अधिक उर्वरक डालकर उत्पादन बढ़ाने का मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता।
नेचुरल फार्मिंग, संतुलित उर्वरक इस्तेमाल, सॉइल हेल्थ कार्ड की सिफारिशों का पालन, जैविक कार्बन बढ़ाना, माइक्रो-न्यूट्रिएंट की कमी दूर करना और पानी के बेहतर प्रबंधन को साथ लेकर चलना जरूरी होगा।
प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक परीक्षण, प्रमाणन, बाजार और किसान प्रशिक्षण से जोड़ना इसकी सफलता के लिए अहम है। साथ ही जहां पूरी तरह प्राकृतिक खेती तुरंत संभव नहीं है, वहां हाइब्रिड मॉडल के जरिए धीरे-धीरे केमिकल फर्टिलाइज़र पर निर्भरता कम की जा सकती है।
कुल मिलाकर, भारत की कृषि के लिए अगला लक्ष्य केवल रिकॉर्ड उत्पादन हासिल करना नहीं, बल्कि कम लागत, स्वस्थ मिट्टी, सुरक्षित भोजन और टिकाऊ उत्पादन का मॉडल तैयार करना होना चाहिए। प्राकृतिक खेती इस दिशा में एक संभावित रास्ता है। यदि इसे वैज्ञानिक प्रमाण, क्षेत्र-विशिष्ट तकनीक, मजबूत बाजार और किसान की आय को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ाया जाता है, तो इससे मिट्टी की सेहत सुधारने, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटाने और भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।

