केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि केरल में समुद्री मछली उत्पादन में समय-समय पर उतार-चढ़ाव जरूर देखने को मिला है, लेकिन दीर्घकालिक स्तर पर किसी बड़ी गिरावट के संकेत नहीं हैं। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, आईसीएआर–केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान की अध्ययन रिपोर्ट में भी कुल समुद्री उत्पादन में किसी महत्वपूर्ण लंबी अवधि की कमी का उल्लेख नहीं किया गया है।
सरकार के मुताबिक, केरल में समुद्री मछली उत्पादन वर्ष 2015 में 4.82 लाख टन था, जो बढ़कर 2018 में 6.09 लाख टन हो गया। बीच के वर्षों में कुछ उतार-चढ़ाव के बाद वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 6.47 लाख टन तक पहुंच गया। इससे संकेत मिलता है कि उत्पादन में अस्थायी बदलाव के बावजूद समग्र तस्वीर सकारात्मक बनी हुई है।
पिछले पांच वर्षों के आंकड़े भी इस प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2019-20 में केरल का समुद्री उत्पादन 4.75 लाख टन था, जो 2020-21 में घटकर 3.92 लाख टन रह गया। इसके बाद 2021-22 में यह 6.01 लाख टन, 2022-23 में 6.91 लाख टन, 2023-24 में 5.81 लाख टन और 2024-25 में 6.47 लाख टन दर्ज किया गया। इसी अवधि में अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन भी लगातार बढ़ा है। वर्ष 2019-20 में यह 2.05 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 2.80 लाख टन पहुंच गया। कुल मत्स्य उत्पादन 2019-20 के 6.80 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 9.27 लाख टन हो गया।
जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों को देखते हुए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत संरक्षण, विविधीकरण और जलीय कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार ने बताया कि पिछले पांच वर्षों और चालू वर्ष के दौरान केरल सरकार के लिए 1,418.51 करोड़ रुपये की मत्स्य विकास परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इन परियोजनाओं में केरल तट पर 42 कृत्रिम रीफ इकाइयों की स्थापना, 20 गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले पोतों की खरीद, 9 एकीकृत आधुनिक तटीय मत्स्य गांव, 6 जलवायु अनुकूल गांव, 1,140 बाइवॉल्व कल्टीवेशन इकाइयां, 822 अलंकरणीय मछली पालन इकाइयां, 283.50 हेक्टेयर मीठे और खारे पानी की जलीय कृषि, 493 जलाशय पिंजरे, 7 जलाशयों का एकीकृत विकास, 708 री-सर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम और 780 बायोफ्लॉक इकाइयां शामिल हैं।
सरकार के अनुसार, इन गतिविधियों का उद्देश्य मछली भंडार का पुनर्जीवन, तटीय मत्स्य क्षेत्र से गहरे समुद्र की ओर विस्तार, और तटीय व अंतर्देशीय क्षेत्रों में वैकल्पिक आजीविका के अवसर पैदा करना है। केरल सरकार ने यह भी बताया है कि राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड के माध्यम से समुद्री पुनर्भरण कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है, जिसके तहत कृत्रिम रीफ के आसपास कोबिया और पोम्पानो के बीज छोड़े जा रहे हैं।
बीज आपूर्ति और विपणन अवसंरचना को मजबूत करने के लिए भी कई परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इनमें एक फिश ब्रूड बैंक, 16 आइस प्लांट और कोल्ड स्टोरेज, 468 पोस्ट-हार्वेस्ट परिवहन इकाइयां, 77 जीवित मछली विक्रय केंद्र, 10 मूल्य संवर्धन इकाइयां, 5 खुदरा बाजार और 90 फिश कियोस्क शामिल हैं। इसके अलावा मछली भंडार संरक्षण के लिए भारतीय विशेष आर्थिक क्षेत्र में पूर्वी तट पर 15 अप्रैल से 14 जून और पश्चिमी तट पर 1 जून से 31 जुलाई तक 61 दिन का समान मत्स्य निषेध लागू किया जाता है।
मत्स्य निषेध अवधि के दौरान सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर सक्रिय पारंपरिक मछुआरों को आजीविका और पोषण सहायता भी दी जाती है। केरल में हर साल 1,71,033 मछुआरों को इस सहायता का लाभ मिलता है।
विपणन संपर्क मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने ई-ट्रेडिंग और ई-मार्केटिंग मंचों को भी बढ़ावा दिया है। राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड ने व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री और अंतर्देशीय मछलियों के बाजार भाव की जानकारी देने के लिए फिश मार्केट प्राइस इन्फॉर्मेशन सिस्टम शुरू किया है। इसके अलावा मत्स्य पालन विभाग ने ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स के साथ समझौता किया है, ताकि पारंपरिक मछुआरे, सहकारी संस्थाएं, मत्स्य उत्पादक संगठन और उद्यमी डिजिटल बाजार के जरिए अपने उत्पाद खरीद और बेच सकें।
यह जानकारी लोकसभा में मत्स्य, पशुपालन और डेयरी मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने एक प्रश्न के उत्तर में दी। आंकड़ों और स्वीकृत परियोजनाओं से यह साफ है कि केरल में मत्स्य उत्पादन को केवल उत्पादन के नजरिए से नहीं, बल्कि संरक्षण, विविधीकरण, बाजार और वैकल्पिक आय के समेकित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया जा रहा है।

