केंद्र सरकार ने संसद के विशेष सत्र (16–18 अप्रैल) से पहले तीन अहम विधेयकों के मसौदे जारी किए हैं, जिनमें देश की संसदीय व्यवस्था में बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं। इन प्रस्तावों में सबसे प्रमुख हैं—लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करना और लोकसभा व राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करना।
ये तीन विधेयक हैं—
- केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
- परिसीमन (डीलिमिटेशन) विधेयक 2026
इन प्रस्तावों को 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है।
लोकसभा सीटें 850 करने का प्रस्ताव
संविधान संशोधन विधेयक के तहत लोकसभा की अधिकतम सीटें 850 करने का प्रावधान है, जिसमें 815 सीटें राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से होंगी। वर्तमान में यह संख्या 543 है।
इस बदलाव के साथ संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन कर 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों पर लगी रोक को हटाने का प्रस्ताव भी है। नई सीटों का निर्धारण ‘ताज़ा प्रकाशित जनगणना’—यानी 2011 के आंकड़ों—के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा।
दक्षिणी राज्यों की चिंता
सीटों के पुनर्निर्धारण को लेकर सबसे ज्यादा चिंता दक्षिण भारत के राज्यों ने जताई है। उनका कहना है कि यदि सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व काफी बढ़ जाएगा, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इसे राज्यों से बिना परामर्श के उठाया गया कदम बताते हुए “लोकतंत्र पर हमला” करार दिया है। वहीं तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए अन्य दक्षिणी राज्यों से एकजुट होने की अपील की है।
महिला आरक्षण 33%: बड़ा कदम, लेकिन बहस जारी
प्रस्तावित विधेयकों में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14% और राज्यसभा में करीब 18% है, जो वैश्विक औसत (27.2%) से कम है।
आरक्षण को परिसीमन के बाद लागू करने और सीटों के रोटेशन का प्रावधान रखा गया है। यह आरक्षण शुरुआती तौर पर 15 वर्षों के लिए लागू होगा, जिसे आगे बढ़ाया जा सकता है।
विपक्ष के आरोप
विपक्षी दलों ने इन प्रस्तावों के समय पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सरकार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों से पहले महिला मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है।
कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर सरकार अपने “असल एजेंडे” को आगे बढ़ा रही है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से चुनावी गणित पर असर पड़ सकता है, खासकर महिला मतदाताओं के रुझान में बदलाव की संभावना के चलते।
आगे क्या?
अगर ये तीनों विधेयक संसद से पारित हो जाते हैं, तो 2029 के आम चुनाव से पहले देश की चुनावी और राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, परिसीमन की प्रक्रिया, राज्यों के बीच सीटों का संतुलन और राजनीतिक सहमति—ये सभी कारक इस पूरे मुद्दे को जटिल बना रहे हैं।
महिला आरक्षण और लोकसभा सीटों के विस्तार का प्रस्ताव एक ऐतिहासिक बदलाव की दिशा में कदम माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ जुड़े राजनीतिक, क्षेत्रीय और संवैधानिक सवालों ने इसे एक बड़ा बहस का विषय बना दिया है। आने वाले दिनों में संसद में इस पर तीखी चर्चा होने की संभावना है।

