देश के डेयरी क्षेत्र में सहकारी समितियों की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है, जिससे लाखों दुग्ध उत्पादक किसानों को स्थिर आय और बेहतर पारिश्रमिक मिल रहा है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जानकारी दी कि डेयरी सहकारी समितियां उत्पादन लागत और बाजार परिस्थितियों के आधार पर दूध के दाम तय करती हैं, जिससे किसानों को उचित मूल्य मिल सके।
सरकार के अनुसार, अधिकांश डेयरी सहकारी समितियों में दूध खरीद और भुगतान की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी हो चुकी है। किसानों को उनके दूध का भुगतान सीधे बैंक खातों में किया जाता है, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है और समय पर भुगतान सुनिश्चित होता है।
पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में डेयरी सहकारी समितियों द्वारा दुग्ध प्रापण और बिक्री दोनों में लगातार वृद्धि देखने को मिली है। वर्ष 2021-22 में कुल दुग्ध प्रापण 59,178 हजार किलोग्राम प्रतिदिन (TKgPD) था, जो 2025-26 में बढ़कर 69,090 TKgPD तक पहुंच गया है। इसी तरह तरल दूध की बिक्री भी 39,087 हजार लीटर प्रतिदिन (TLPD) से बढ़कर 46,295 TLPD हो गई है।
राज्यवार आंकड़ों में Gujarat दुग्ध प्रापण में सबसे आगे है, जहां 2025-26 में 31,422 TKgPD दूध का संग्रह किया गया। इसके अलावा Karnataka, Maharashtra, Rajasthan और Uttar Pradesh जैसे बड़े राज्यों में भी डेयरी गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
तरल दूध बिक्री के मामले में Delhi सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है, जहां 2025-26 में 8,575 हजार लीटर प्रतिदिन दूध की बिक्री हुई। इसके अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी दूध की खपत लगातार बढ़ रही है।
सरकार डेयरी सहकारी समितियों को और अधिक सशक्त बनाने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं चला रही है। इनमें “श्वेत क्रांति 2.0” प्रमुख है, जिसका उद्देश्य अगले पांच वर्षों में दुग्ध प्रापण को 50% तक बढ़ाना है। इस योजना के तहत अब तक 24,000 से अधिक नई डेयरी सहकारी समितियां बनाई जा चुकी हैं और हजारों समितियों को सशक्त किया गया है।
इसके अलावा, Animal Husbandry Infrastructure Development Fund (एएचआईडीएफ) के तहत डेयरी प्रसंस्करण और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 3% ब्याज अनुदान दिया जा रहा है। वहीं, National Livestock Mission (एनएलएम) के जरिए पशुपालन, नस्ल सुधार और उद्यमिता को बढ़ावा दिया जा रहा है।
किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए डेयरी सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों को वित्तीय सहायता भी प्रदान की जा रही है। इसके तहत सॉफ्ट लोन पर ब्याज में छूट दी जाती है, जिससे संकट की स्थिति में भी डेयरी संचालन प्रभावित न हो।
सरकार ने डेयरी क्षेत्र में स्थिरता और पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दी है। “कचरे से कंचन” की अवधारणा के तहत गोबर और अन्य अपशिष्टों का वैज्ञानिक उपयोग कर अतिरिक्त आय के अवसर पैदा किए जा रहे हैं। इसी दिशा में दो नई बहु-राज्य सहकारी समितियों का गठन किया गया है, जो पशु आहार, रोग नियंत्रण, कृत्रिम गर्भाधान और गोबर प्रबंधन जैसी सेवाएं प्रदान करेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि डेयरी सहकारी मॉडल किसानों के लिए सबसे भरोसेमंद व्यवस्था बनकर उभरा है। इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि हो रही है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।
कुल मिलाकर, डेयरी सहकारी समितियों के जरिए किसानों को बेहतर पारिश्रमिक, पारदर्शी भुगतान और सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है, जो भारत को विश्व के अग्रणी दुग्ध उत्पादक देशों में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

